Section 325 CrPC धारा 325 दण्ड प्रक्रिया सहिंता, 1973

Section 325 CrPC धारा 325 दण्ड प्रक्रिया सहिंता, 1973

हेलो दोस्तों,

आज हम बात करने बाले है Section 325 CrPC धारा 325 दण्ड प्रक्रिया सहिंता, 1973  की यह पोस्ट Hindi व् English दोनों भाषाओ में उपलब्ध है 

और साथ ही हमने लॉ की कठिन भाषा को सरलीकरण कर भी समझने का प्रयास किया है तो चलिए सुरु करते है।

Section 325 CrPC धारा 325 दण्ड प्रक्रिया सहिंता, 1973
Section 325 CrPC धारा 325 दण्ड प्रक्रिया सहिंता, 1973

प्रक्रिया जव मजिस्ट्रेट पर्याप्त कठोर दण्ड का आदेश नही दे सकता 

  1. जव कभी अभियोजन और अभियुक्त का साक्ष्य सुनने के पशचात् मजिस्ट्रेट की यह राय है कि अभियुक्त दोषी है और उसे उस प्रकार के दण्ड से भिन्न प्रकार का दण्ड या उस दण्ड से अधिक कठोर दण्ड जो वह मजिस्ट्रेट देने के लिए सशक्त है दिया जाना चाहिए अथवा द्धितिय वर्ग मजिस्ट्रेट होते हुए उसकी यह राय है कि अभियुक्त से धारा 106 के अधीन वंधपत्र निष्पादित करने की अपेक्षा की जानी चाहिए तव वह अपनी राय अभिलिखित कर सकता है और कार्यवाही तथा अभियुक्त को मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट को, जिसके वह अधिनस्थ हो भेज सकता है। 
  2.  जव एक से अधिक अभियुक्तो का विचारण एक साथ किया जा रहा है और मजिस्ट्रेट ऐसे अभियुक्तो मे से किसी के बारे मे उपधारा (1) के अधीन कार्यवाही करना आवश्यक समझता है तब वह उन सभी अभियुक्तो को , जो उसकी राय मे दोषी है , मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट को भेज देगा।
  3. यदि मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट जिसके पास कार्यवाही भेजी जाती है ठीक समझता है तो पक्षकारो की परीक्षा कर सकता है और किसी साक्षी को, जो पहले ही मामले मे साक्ष्य दे चुका है , पुनः बुला सकता है और उसकी परीक्षा कर सकता है और कोई अतिरिक्त साक्ष्य मांग सकता है और ले सकता है और मामले मे ऐसा निर्णय , दण्डादेश या आदेश देगा , जो वह ठीक समझता है और जो विधि के अनुसार है।

Crpc Section 325 in hindi

आसान शब्दों, कहे तो -

 Section 325 CrPC धारा 325 का सरल भाषा मे अर्थ यह है कि यदि ऐसी परिस्थिति है कि किसी दाण्डिक मामले मे द्धितिय वर्ग के मजिस्ट्रेट Magistrate को यह प्रतित होता है कि मामले मे दिये गये साक्ष्य यानी गवाही के आधार पर अभियुक्तो को जो सजा वास्तविकता मे मिलनी चाहिए। 

उस सजा को देने का अधिकार मुझे नही है क्योकि द्धितिय वर्ग का मजिस्ट्रेट किसी भी दाण्डिक मामले मे 1 साल तक की सजा और प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट 3 साल तक की सजा देने के लिए ही सशक्त होता है। 

यानी वह 1 साल से ज्यादा समय के दण्ड वाले अपराध के सम्वन्ध मे सजा नही सूना सकता तो Section 325 CrPC धारा 325 धारा 325 के आधार पर यदि उसे लगता है कि मामला ऐसा है कि इसमे अभियुक्तो को अधिक सजा मिलनी चाहिए। 

तव वह ऐसे मामले को मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट को भेज सकता है और अभियुक्त से धारा 106 के अधीन जमानती मांग सकता है यहॉ Section 325 CrPC धारा 325 के (1) का यही अर्थ है। 

क्लोज (2) का यह कहना है कि यदि ऐसे मामले मे एक से ज्यादा अभियुक्त है तो ऐसे मे वह मजिस्ट्रेट सभी के सम्बन्ध मे मामले को मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के यहॉ भेज सकता है। 

(3 ) क्लोज का कहना यह है कि यदि इस प्रकार कोई द्धितिय वर्ग मजिस्ट्रेट मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट को कोई मामला भेज देता है तो ऐसे मे अगर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट चाहे तो दुवारा से गवाही करा सकता है या मामले के किसी तथ्य पर अतिरिक्त गवाही की मांग कर सकता है।
 
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  1. Section 125 CrPC in hindi
  2. Section 129 CrPC in hindi
  3. Section 130 CrPC in hindi

जेल में खाना कैसा मिलता है | how to get food in prison hindi

जेल में खाना कैसा मिलता है | how to get food in prison hindi

हेलो दोस्तों  स्वागत है आपका अपने ब्लॉग Gyani Law में आज हम फिर एक और मजेदार टॉपिक पे बात करने जा रहे है कि जेल में कैसा खाना मिलता है। 

साथ ही हम जानेंगे की उस खाने को बेहतर बनाने के लिए बंदी लोग क्या-क्या करते है और किस तरह से खाना दिया जाता है सभी पर चर्चा करेंगे तो चलिए शुरू करते है।

यह आपको जानना काफी महत्वपूर्ण है कि जेल में किस प्रकार का खाना उपलब्ध कराया जाता है क्युकी, जो लोग जेल गए है या जिन्होंने सजा काटी है बह लोग जानते है कि जेल का खाना कैसा मिलता है, 

परन्तु यह लेख उन लोगो के लिए है जो घर में सब्जी में नमक तेज हो जाने पर घर सर पे उठा लेते है, या अपने घर में बच हुआ खाने को फेंक देते है,

इसलिए अगर आपको पता होगा की ऐसी जगहों पर खाना कैसा मिलता है तो सायद आप को खाने की कदर रहे,

साथ ही कुछ लोगो को यह जानने की रुचि भी है कि आखिर जेल में कैसा खाना मिलता होगा या क्या क्या खाने को मिलता है,

जेल में खाना | food in prison hindi

जेल का नाश्ता / prison breakfast

जेल में रोज एक टाइम नाश्ता और 2 टाइम खाना मिलता है पहले हम नाश्ते की बात करते है तो नाश्ते सुबह 7 बजे मिलता है जिसमे चाय होती है चूँकि यह सरकारी चाय होती है इसलिए इसमें दूध ढूढ़ने से भी आपको नहीं मिलेगा। 

चाय के साथ साथ एक दिन उबले हुए चने मिलते है जो की काफी अच्छे होते है और उबले हुए चने सुबह को खाना शरीर के लिए भी काफी फयडेबंद रहता है,

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ठीक इसी तरह दूसरे दिन दलिया मिलता है और तीसरे दिन बंद मिलते है यानि कि ब्रेड यही सिलसिला फिर से रिपीट होता रहता है।

जेल लंच / prison lunch

अब बात करते है दुपहर के खाने की तो दुपहर का खाना 11:30 से 12:00 बजे तक आ जाता है चाहे कितना भी अंधी तूफान क्यों न हो,

दोपहर का खाना ज्यादातर सामान ही रहता है हर एक कैदी को, चार रोटी, कुछ चावल, दाल, और कोई एक सब्जी दी जाती है। 

दाल की बात करें तो उसमे बहुत अधिक पानी होता है और यदि उसे थोड़ी देर के लिए रख दिया जाये तो उसमे दाल निचे बैठ जाती है पानी ऊपर रह जाता है,

उसके बाद अगर इस पानी को निकाल दिया जाये तो यह खाने के लिए तैयार हो जाती है। इसी के साथ सब्जी की बात करें तो सब्जी में आलू और मूली ही रहतीं ह,

आलू की सब्जी ठीक होती है परन्तु मूली की सब्जी खाने के लायक नहीं रहती है खाने की खुराक ठीक होती है इतने खाने में एक नार्मल इंसान का पेट भर जाता है। लेकिन कई बार कुछ लोग होते है,

जिनकी खाने की खुराक ज्यादा होती है तो ऐसे कैदी का अगर इस डाइट में पेट नहीं भरता तो बह अलग से लिखबा सकता है कि इतने खाने में मेरा पेट नहीं भरता आदि। तो उसको जेल में डबल खुराक भी देदी जाती है। 

भारतीय जेल भोजन | indian prison food hindi

जेल में रात का खाना / prison dinner

अब बात करते है शाम के खाने की तो जो शाम का खाना होता है बह शाम 4 से 5 बजे के बीच ही बाट दिया जाता है दुपहर के खाने की तरह ही शाम का खाना होता है,

बस शाम के खाने में चावल नहीं होते है बल्कि 6 रोटी सब्जी और दाल दी जाती है जिसमे भी मूली की सब्जी या फिर आलू की सब्जी ही होती है। 

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खाना शाम 4 से 5 बजे के बीच ही बाट दिया जाता है तो कुछ लोग तो खाना उसी समय खा लेते है जब खाना गरम होता है लेकिन कुछ लोग उस खाने को रात को 8 से 9 बजे के बीच 

अपनी इच्छा अनुशार खाते है तब तक बह खाना बिलकुल ठंडा हो चुका होता है। 

जेल के खाने की क्वालिटी काफी लो होती है और बहां का खाना देख बहार के खाने की बहुत याद आती है कि हम बाहर अच्छे खासे खाने को हम कैसे फेक देते थे ,

किस प्रकार नखरे दिखाते थे और किस तरह हम साफ खाने की रेस्पेक्ट नहीं करते थे। 

Jail Food in Hindi

अब बात करते है कि इस प्रकार का खाना जो जेल में मिलता है इसको बेहतर बनाने के लिए कैदी क्या क्या करते है ,

इस तरह का खाना खाने से बचने के लिए कैदी काफी सारी चीजे करते है जैसे की जेल में बहार की सब्जिया अंदर आने देते है तो जब भी कोई मिलायी के लिए आता है यानि कैदी से मिलने आता है 

तो कैदी उनसे सब्जिया मगा लेते है, जैसे कि गाजर, मूली, खीरा, प्याज़ आदि इस तरह बहार से जब कोई आता है मिलायी के दौरान तो बह सब्जिया दे जाता है,

तो कैदी उन सब्जियों का सलाद बना लेते है और मिर्च प्याज़ बगेरा की चटनी बना लेते है जेल में कूटने के लिए या पीसने के लिए कोई चीज़ नहीं होती है,

तो जो मग दिया जाता है मग्गा चाय लेने के लिए या दाल लेने के लिए तो बह स्टील मग में सभी चीज़ दाल कर और प्लास्टिक की बोतल में पानी भरकर उसे उल्टा कर 

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उसके ठक्कन से उस चटनी को बनाते है अब आप सोच लीजिये की क्या चटनी बनती होगी खेर इस तरह कैदी अपनी चटनी तैयार कर लेते है तो उसके साथ खाना आसानी से खा लिए जाता है। 

इसके साथ जेल में दूध, दही, मठ्ठा भी मिलता है जो कि खरीदना पड़ता है अब आप सोचेंगे पैसे कहाँ से आते है तो जो भी व्यक्ति मिलायी को आता है बह कुछ पैसे दे जाता है ,

उन पैसो को कूपन में बदल दिया जाता है उसके बाद कैदी उस कूपन से जेल की कैंटीन से दूध, दही, मठ्ठा आदि जैसी चीज़े खरीद सकते है। 

तो कैदी दूध, दही, मठ्ठा खरीद कर उसे खाने के साथ खाते है जिससे भी बह खाना बेहतर हो जाता है। 

अगर सीधे शब्दों में कहूं की जेल में कैसा खाना मिलता है तो जैसा डॉक्टर अपने मरीज को बीमारी के दौरान परहेज में जो खाना बताते है ठीक बेसा ही ,

इस खाने की ख़ास बात यह होती है कि यह खाना खाने के बाद कैदी ज्यादा बीमार नहीं होते है क्युकी इस खाने में तेल नहीं होता, मिर्च नहीं होती है.

तो जब खाने में तेल और मिर्च नहीं होगी तो ऐसे खाने से बीमारियां कम से कम होंगी। जेल में कई लोग ऐसे भी है जिनको शुगर की बीमारी ब्लड प्रेस्सेर की बीमारी आदि थीं। 

जेल में रहने के बाद यह बीमारी काफी हद तक ठीक हो गयीं थीं। जेल का खाना कई सारे कैदियों को लग भी जाता है इसलिए काफी सारे लोग जो जेल में दुबले-पतले आते हैं। 

बह काफी मोटे ताज़ी होकर जेल से निकलते है और कुछ लोगो को बह खाना नहीं भाता तो ऐसे लोग बीमार भी पड़ जाते है व् दुबले भी हो जाते है।

आखिर में जेल के खाने से इंसान को खाने की कदर और उसकी वैल्यू पता लगती है कि आखिर खाना हमारे जीवन का कितना बहमूल्य हिस्सा है,

इसीलिए हमे जो भी मिले जैसा भी खाना मिले खा लेना चाहिए और जो खाना बचता है उसको कभी भी कूड़ेदान में नहीं फेकना चाहिए बल्कि किसी को दे देना चाहिए या फिर जानबरों को खिला देना चाहिए।

आशा करते है की आप जेल में खाना कैसा मिलता है इससे रूबरू हो गए होंगे अगर आप हमे कुछ बताना या पूछना चाहते है तो कमेंट बॉक्स में जरूर बातएं हमे अच्छा लगेगा। 

साथ ही आप हमसे YouTube चैनल Gyani law पर भी जुड़ सकते है जुड़ने के लिए चैनल को सब्स्क्रिबे करें, हम मिलते है फिर एक नए टॉपिक के साथ तब तक के लिए धन्यवाद। 

जेल में कैसा खाना मिलता है ?

जेल में रोज एक टाइम नाश्ता और 2 टाइम खाना मिलता है नाश्ते में चाय और उबले हुए चने व्  दलिया मिलता है दुपहर के खाने में 4 रोटी चाबल सब्जी और दाल मिलती है ठीक शाम को 6 रोटी दाल और सब्जी खाने को दी जाती है। 

जेल का खाना कैसा होता है ?

जेल का खाना घर जैसा तो बिलकुल नहीं होता है बस यूँ समझिये की एक इंसान का पेट भरने के लिए काफी भोजन मिलता है।

जेल में कैसा खाना मिलता है ?

जेल में रोज एक टाइम नाश्ता और 2 टाइम खाना मिलता है नाश्ते में चाय और उबले हुए चने व् दलिया मिलता है दुपहर के खाने में 4 रोटी चाबल सब्जी और दाल मिलती है ठीक शाम को 6 रोटी दाल और सब्जी खाने को दी जाती है।

जेल का खाना कैसा होता है ?

जेल का खाना घर जैसा तो बिलकुल नहीं होता है बस यूँ समझिये की एक इंसान का पेट भरने के लिए काफी भोजन मिलता है।

Section 139 Crpc in Hindi | धारा 139 Crpc

Section 139 Crpc in Hindi | धारा 139 Crpc

धारा 139 Section 139 Crpc in Hindi उन स्थतियो में प्रावधान करती है कि जब धारा 137 धारा 138 में दिए गए प्रावधानों के अनुसार
 
बह व्यक्ति जिसके विरुद्ध आदेश पारित किया गया है। उपस्थित होकर उक्त आदेश को पूरा न करने का कारण दर्शित करता है
 
तब ऐसे कारण की सत्यता जांचने के लिए कार्यपालक मजिस्ट्रेट धारा 139 Section 139 Crpc in Hindi में दिए गए प्रावधानों के आधार पर ऐसे स्थान या जगह का निरिक्षण या कहे तो इंस्पेक्शन करा सकता है।
 
और अगर बह चाहे तो उक्त कार्यो के आवश्यक समाधान के लिए किसी विशेषज्ञ से राय ले सकता है उसे समन कर सकता है उसे समन द्वारा आदेशित कर सकता है।
 
कि बह उक्त प्रकरण के सम्बन्ध में उपस्थित हो कर अपनी राय प्रकट करे और ऐसी राय के बाद मजिस्ट्रेट चाहे तो ऐसे विशेषज्ञ की परीक्षा भी कर सकता है। 
 
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 Section 139 Crpc in Hindi
 
स्थनीय अन्वेषण के लिए निदेश देने और विशेषज्ञ की परीक्षा करने की मजिस्ट्रेट की शक्ति -
 
मजिस्ट्रेट धारा 137 या धारा 138 के अधीन किसी जाँच के प्रयोजनों के लिए -
 
(क ) ऐसे व्यक्ति द्वारा , जिसे बह ठीक समझे स्थानीय अन्वेषण किये जाने के लिए निदेश दे सकता है , अथवा 
 
(ख़) किसी विशेषज्ञ को समन कर सकता है और उसकी परीक्षा कर सकता है। 

राम अवतार सोनी बनाम महन्त लक्ष्मीधर दास

राम अवतार सोनी बनाम महन्त लक्ष्मीधर दास

(उच्चतम न्यायालय)
श्रीमती आर० बानुमथी एवं सुश्री इन्दिरा बनर्जी न्यायमूर्तिगण
सिविल अपील संख्या 10684-10685 वर्ष 2018
24 अक्टूबर 2018 को विनिश्चित

राम अवतार सोनी

बनाम

महन्त लक्ष्मीधर दास एवं अन्य

निर्णय

श्रीमती आर० बानुमथी, न्यायमूर्तिण्-अनुमति प्रदान की गयी।

2. ये अपीलें सी० एम० पी० संख्या 684 वर्ष 2016 में उड़ीसा उच्च न्यायालय कटक द्वारा पारित किये गये दिनांक 30/6/2016 के निर्णय से उद्भूत होती हैं, जिसमें और जिसके द्वारा उच्च न्यायालय ने प्रथम प्रत्युत्तरदाता के द्वारा दाखिल की गयी अपील को अनुज्ञात किया था, 

तद्द्वारा सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश XXVI, नियम 10क के अधीन पारित किये गये जिला न्यायाधीश के आदेश को अपास्त कर दिया था, तदद्वारा वसीयतकर्ता नटबर दास के स्वीकृत हस्ताक्षरों से तुलना के लिये प्रश्नगत वसीयत के हस्ताक्षर को हस्तलेख विशेषज्ञ के पास भेजने की अपीलार्थी की प्रार्थना को अनुज्ञात किया था।

3. वर्तमान अपीलार्थी ने प्रोबेट प्रकीर्ण वाद संख्या 14/5 वर्ष 2000ध/1997 में प्रथम प्रत्युत्तरदाता, अर्थात् लक्ष्मीधर महापात्रा के पक्ष में प्रदान किये गये प्रोबेट की वापसी की ईप्सा करते हुये सी० एस० संख्या

2/34 2008/2003 वर्ष दाखिल किया था। प्रोबेट प्रकीर्ण वाद में, महन्त नटबर दास के द्वारा निष्पादित की गयी प्रश्नगत वसीयत विवाद की विषयवस्तु थी, परन्तु अपीलार्थीध्वादी के अनुसार उक्त नटबर दास ने वसीयतकर्ता के रूप में प्रथम प्रत्युत्तरदाता-लक्ष्मीधर महापात्रा के पक्ष में कोई वसीयत कभी निष्पादित नहीं की थी। वादपत्र में यह कहा गया है कि स्वगीय महन्त नटबर दास ने अपने जीवनकाल के दौरान ।

जसोदा दासी के द्वारा अपने पक्ष में निष्पादित की गयी वसीयत के प्रोबेट के लिये प्रोबेट वाद संख्या 19/13 वर्ष 1982 दाखिल किया था और उक्त कार्यवाही में, महन्त नटबर दास का स्वीकृत हस्ताक्षर याचिका शपथ-पत्र, वकालतनामा अभिसाक्ष्य में उपलब्ध होने के लिये कहा गया है और उन दस्तावेजों में विद्यमान महन्त नटबर दास के हस्ताक्षरों को प्रश्नगत वसीयत के साथ तुलना के लिये हस्तलेख विशेषज्ञ के पास भेजा जाना आवश्यक है।