Written Statement (प्रतिवादपत्र) under CPC in hindi

Written Statement (प्रतिवादपत्र) under CPC in hindi

प्रतिवादपत्र जिसे अग्रेजी मे हम Written Statement कहते है असल मे यह प्रतिवादपत्र या लिखित कथन शव्द सिविल प्रक्रति के मुकदमे से सम्बन्धित शव्द होता है। 

इस का प्रयोग Civil प्रक्रति के मुकदमे के सम्बन्ध मे किया जाता है तो आईये समझते है कि 

  1. प्रतिवादपत्र क्या होता है?

  2. यह कहां काम आता है?

  3. इसके सम्वन्ध मे कहॉ प्रावधान किया गया है?

What is Written Statement in hindi?

सरल भाषा मे अगर हम वात करे तो लिखित कथन या प्रतिवादपत्र (Written Statement) उस व्यक्ति के द्वारा कोर्ट मे दाखिल किया जाता है। जिसके खिलाफ सिविल कोर्ट में कोई मुकदमा चल रहा हो

असल मे लिखित कथन उन सभी वातो का लिखित मे जवाव होता है। जिन वातो को कहते हुए वादी कोर्ट मे अपना दावा पेश करता है

लिखित कथन प्रतिवादी द्वारा यानी जिस व्यक्ति के खिलाफ मुकदमा दायर किया गया है। वादी के दावे के जवाव के रूप मे कोर्ट मे दाखिल किया जाता है

इसमे किन किन वातो का विवरण देना होता है इस सम्बन्ध मे सिविल प्रक्रिया संहिता मे आवश्यक प्रावधान किये गये है तो आईये उन्हे समझते है । 

Written Statement प्रतिवादपत्र under CPC in hindi | Order-8 Rule-1,2,3,4,5

सिविल प्रक्रिया  संहिता के आदेश 8 के अर्न्तगत लिखित कथन यानी प्रतिवादपत्र के सम्वन्ध मे प्रावधान किया गया है।

आदेश 8 के नियम 1 से 6 तक उन सभी प्रावधानो का वर्णन किया गया है कि लिखित कथन मे किन किन वातो का विवरण दिया जाना होता है।

CPC Order-8 Rule-1 

आदेश 8 नियम 1 वताता है कि प्रतिवादी लिखित कथन उसपर सम्मन की तामील हाने के 30 दिन के भीतर न्यायालय मे दाखिल करेगा ।

लेकिन अगर प्रतिवादी तामील से 30 दिन के भीतर लिखित कथन दाखिल नही कर पाता है तो ऐसी स्थति मे न्यायालय ऐसे समय को वढा सकती है।

लेकिन न्यायालय द्वारा इस प्रकार वढाया गया समय समन की तामिल की दिनॉक से 90 दिन से अधिक नही होगा ।

Order-8 Rule-1 की मुख्यतः भाषा निम्न प्रकार है।

प्रतिवादी अपनी प्रतिरक्षा का लिखित कथन उस पर समन तामील हाने के दिनांक से तीस दिन के भीतर उपस्थित करेगा।

परन्तु जहॉ पर प्रतिवादी तीस दिन की उक्त अवधि के भीतर लिखित कथन दाखिल करने मे असफल रहता है

वहॉ उसे ऐसे अन्य दिन पर जो न्यायालय द्वारा अभिलिखित किए जाने वाले कारणो से विनिर्दिष्ट किया जाएगा।लेकिन जो समन की तामील के दिनांक से नव्वे दिन के वाद का नहीं होगा उसे दाखिल करने के लिए अनुज्ञा दी जायेगी।

इसी प्रक्रम मे आदेश 8 मे नियम 1(क) का उल्लेख किया गया है नियम 1(क) वताता है कि प्रतिवादी का यह कर्तव्य है।

कि वह लिखित कथन दाखिल करते समय वे सारे दस्तावेज या Document भी दाखिल करे जिन पर वह यह विश्वास करता है।

कि वह मुकदमे मे उसका पक्ष रखने मे सहायक होगे यानी प्रतिवादी उन सभी दस्तावेजो को भी अपने प्रतिवादपत्र (Written Statement) के साथ मे न्यायालय मे पेश करे जिससे उसे न्यायालय मे अपना पक्ष रखने मे मदद मिल सके।

और ऐसे सभी दस्तावेजो को प्रतिवादी सूची यानी एक लिस्ट के साथ पेश करेगा इस लिस्ट मे उन दस्तावेजो के सम्वन्ध में सारा विवरण देना होगा और आदेश 8 नियम 1 (क) यह भी प्रावधान करती है।

कि इस प्रकार लिखित कथन और दस्तावेजो को दाखिल करने के साथ उन सभी दस्तावेजो एंव लिखित कथन की एक प्रतिलिपि भी दाखिल की जायेगी।

इसकी जो मुख्य भाषा है वह यह है कि जहॉ प्रतिवादी की प्रतिरक्षा का आधार ऐसी दस्तावेज है या उसने अपनी प्रतिरक्षा या मुजराई के दावे या प्रतिदावे के समर्थन मे ऐसी दस्तावेज पर विश्वास किया है।

जो उसके कब्जे मे या शक्ति मे है वही वह ऐसे दस्तावेज को सूची मे प्रविष्ट करेगा और न्यायालय मे उस समय पेश करेगा जव उसके द्वारा लिखित कथन उपस्थित किया जाता है।

और वह लिखित कथन के साथ दाखिल की जाने वाली दस्तावेज या उसकी प्रति उसी समय परिदत्त करेगा। 

Written Statement in CPC

नियम 1 (क) यह भी वताता है जव कोई ऐसा दस्तावेज या Document है जो वास्तव मे प्रतिवादी को लगता है कि वह दस्तावेज उसके मुकदमे के लिए लाभकारी होगा।

लेकिन वो किसी और के पास है या किसी अन्य व्यक्ति के कव्जे मे है तो प्रतिवादी को उस दस्तावेज के कव्जे के सम्बन्ध मे पूरा विवरण अपने लिखित कथन मे देना होगा।

मुख्य रूप से भाषा यह है कि जहॉ कोई ऐसी दस्तावेज प्रतिवादी के कव्जे या शक्ति मे नहीं है वहॉ वह जहॉ कहीं सम्भव हो यह अधिकथित करेगा कि वह किसके कव्जे या शक्ति मे है।

इसी प्रक्रम मे नियम-1(क) यह प्रावधान भी करता है कि अगर कोई ऐसा दस्तावेज था जो प्रतिवादी द्वारा लिखित कथन दाखिल करते समय कोर्ट मे दाखिल किया जाना चाहिए था।

लेकिन दाखिल नही किया गया तो ऐसा कोई भी दस्तावेज न्यायालय की अनूमति या न्यायालय की इजाजत के विना दाखिल नही किया जा सकता यानी अगर इस तरह कोई दस्तावेज दाखिल करने से रह गया है।

तो न्यायालय मे उस दस्तावेज को दाखिल करने की आज्ञा पाने के लिए प्रार्थनापत्र देना होगा न्यायालय उस पर विचार करेगी और यदि न्यायालय को लगता है।

कि दस्तावेज लिए जाने योग्य है तव न्यायालय उसे दाखिल करने की अनुमति देगी।

इसकी मुख्य भाषा है कि कोई दस्तावेज जो प्रतिवादी द्वारा इस नियम के अन्तर्गत न्यायालय मे पेश किया जाना था लेकिन इस प्रकार पेश नही किया गया है।

न्यायालय की इजाजत के विना वाद की सुनवाई पर उसकी ओर से साक्ष्य मे नही लिया जाएगा।

यहॉ नियम 1 (क) मे एक यह भी प्रावधान है कि इस नियम की कोई भी वात ऐसी दस्तावेज को लागू नही होगी जो।

(क)   वादी के साक्षियो की प्रतिपरीक्षा के लिए पेश की गयी हो अथवा
(ख)   साक्षी को केवल उसकी स्मूति ताजा करले के लिए दी गयी हो ।

यानी उन सभी दस्तावेजो पर यह नियम लागू नही होगा जो सिर्फ साक्षि यानी गवाह की यादाश्त को ताजा करने के लिये पेश किये गये हो।

CPC Order-8 Rule-2

तो नियम 2 वताता है कि प्रतिवादी को अपने प्रतिवाद पत्र (Written Statement) मे उन सभी वातो का वर्णन करना होगा जिन वातो की सत्यता या वास्तविकता को छिपाते हुए वादी ने उसके खिलाफ मुकदमा दायर किया है।

यानी वह उन सभी तथ्यो को वह अपने प्रतिवाद पत्र (Written Statement) मे लिखेगा जो वास्तविक मे सत्य हो और जिनके द्वारा वह अपनी वात को अच्छे से न्यायालय के समक्ष प्रकट कर सके ।

सामान्यतः नियम 2 की भाषा इस प्रकार है कि प्रतिवादी को अपने अभिवचन द्वारा वे सव वाते उठानी होगी जिनसे यह दर्शित होता है।

कि वाद या विधि की दृष्टी से वह व्यवहार शून्य है या शून्यकरणीय है और प्रतिरक्षा के सब ऐसे आधार उठाने होंगे जो ऐसे है कि यदि वे न उठाए गए तो यह संभव्य है।

कि उनके सहसा सामने आने से विरोधी पक्षकार चकित हो जाएगा या जिनसे तथ्य के ऐसे विवाद्यक पैदा हो जाएगे जो वादपत्र से पैदा नही होते है।

उदाहरणार्थ कपट परिसीमा निर्मूक्ति संदाय पालन या अवैधता दर्शित करने वाले तथ्य।    

अव वात करते है नियम 3 की नियम तीन मुख्य रूप से यह वताता है कि प्रतिवादी को अपने लिखित कथन मे उन सभी वातो के प्रात्याख्यान यानी स्वीकार न हाने के वारे मे अलग से विवरण देना होगा।

कि वह वादी के वादपत्र मे दी गई किन वातो को अस्वीकार करता है वादी के वादपत्र मे दी गई्र वातो का अस्वीकार करना ही प्रात्याख्यान कहलाता है।

यानी प्रतिवादी को यह मुख्य रूप से अपने प्रतिवाद पत्र मे विवरण देना होगा कि वह वादी द्वारा अपने वादपत्र मे कहे गये किस कथन को स्वीकार करता है और किस कथन को अस्वीकार ।

नियम 3 की मुख्य रूप मे भाषा इस प्रकार है कि प्रतिवादी के लिए यह पर्याप्त नही होगा कि वह अपने लिखित कथन मे उन आधारो का साधारणतः प्रत्याख्यान कर दे जो वादी द्वारा अभिकथित है ,

किन्तु प्रतिवादी के लिए यह आवश्यक है कि वह नुकसानी के सिवाय ऐसे तथ्य संबंधी हर एक अभिकथन का विनिर्दिष्टतः विवेचन करे जिसकी सत्यता वह स्वीकार नही करता है ।

 इसे भी पढ़े 

  1. What is Summons? समन क्या होता है ?
  2. CPC Order-1 Rule-1,2,3 in Hindi  
  3. काउंटर क्लेम क्या है ?

CPC Order-8 Rule-4

नियम 4 वताता है कि प्रतिवादी द्वारा जव अपने लिखित कथन मे वादी के वादपत्र मे दीये गये किसी कथन को अस्वीकार या उसका प्रात्याख्यान किया जायेगा।

तो प्रतिवादी ऐसा प्रात्याख्यान सिर्फ सरसरी तौर पर नही करेगा यानी प्रतिवादी को उस कथन को अस्वीकार करने के साथ उस कथन के वारे मे स्पष्टिकरण भी देना चाहिए।

नियम 4 के अन्तर्गत इस सम्बन्ध मे एक उदाहरण भी दिया गया है ।

Written Statement in hindi

नियम 4 की भाषा निम्न प्रकार है कि जहॉ प्रतिवादी वाद मे के किसी तथ्य के अभिकथन का प्रात्याख्यान करता है वहॉ उसे वैसा वाग्छलपूर्ण तौर पर नही करना चाहिए।

वरन सार की वात का उत्तर देना चाहिए। उदाहरणार्थ यदि यह अभिकथित किया जाता है कि उसने एक निश्चित धन की राशि प्राप्त की तो यह प्रात्याख्यान कि उसने वह विशिष्ट राशि प्राप्त नही की पर्याप्त नही होगा।

वरन् उसे यह चाहिए कि वह प्रत्याख्यान करे कि उसने वह राशि या उसका कोई भाग प्राप्त नही किया या फिर यह उपवर्णित करना चाहिए।

कि उसने कितनी राशि प्राप्त की और यदि अभिकथन विभिन्न परिस्थितियों सहित किया गया है तो उन परिस्थितियो सहित उस अभिकथन का प्रात्याख्यान कर देना पर्याप्त नही होगा।

CPC Order-8 Rule-5

नियम 5 वताता है कि यदि प्रतिवादी द्वारा अपने लिखित कथन मे वादपत्र मे प्रस्तुत तथ्य सम्बन्धि हर कथन के स्वीकार या अस्वीकार होने का कथन नही किया गया है। 

तो और यदि किसी कथन के वारे मे यह नही कहा जाता है कि वह स्वीकार नही है तो वह कथन स्वीकार कर लिया समझा जायेगा।

भाषा यह है कि यदि

1. वादपत्र मे के तथ्य सबंधी हर अभिकथन का विनर्दिष्टतः यह आवश्यक विवक्षा से प्रात्याख्यान नही किया जाता है या प्रतिवादी के अभिवचन मे यह कथन कि वह स्वीकार नही किया जाता तो जहॉ तक निर्योग्यताधीन व्यक्ति को छोडकर किसी अन्य व्यक्ति का संबंध है वह स्वीकार कर लिया गया माना जायेगा नियम 5 यह भी वताता है कि
 
2. परन्तु ऐसे स्वीकार किए गए किसी भी तथ्य के ऐसी स्वीकृति के अलावा अन्य प्रकार से साबित किए जाने की अपेक्षा न्यायालय स्वविवेकानुसार कर सकेगा ।

3. जहां प्रतिवादी ने अभिवचन फाइल नही किया है वहां न्यायालय के लिए वादपत्र मे अन्तर्विष्ट तथयो के आधर पर निर्णय सुनाना जहां तक निर्योग्यताधीन व्यक्ति को छौडकर किसी अन्य व्यक्ति का सम्बन्ध है विधिपूर्ण होगा किन्तु न्यायालय किसी ऐसे तथ्य को साबित किए जाने की अपेक्षा स्वविवेकानुसार कर सकेगा।

4. न्यायालय अपनियम 1 के परन्तु के धीन या उपनियम 2 के अधीन अपने विवेकाधिकार का प्रयोग करने मे इस तथ्य पर सम्यक् ध्यान देगा कि क्या वादी किसी प्लीडर को नियुक्त कर सकता था या उसने किसी प्लीडर को नियुक्त किया है 

5. इस नियम के धीन जअ कभी निर्णय सुनाया जाता है तव ऐसे निर्णय के अनुसार डिक्री तैयार की जाएगी और ऐसी डिक्री पर वही तारीख दी जायेगी जिस तारीख को निर्णय सुनाया गया था।
 
तो आज हमने जाना कि प्रतिवाद पत्र (Written Statement) क्या होता है और इसमे किन वातो को अभिलिखित किया जाना आवश्यक होता है । 
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