आपसी सहमति से तलाक कैसे ले | Divorce By Mutual Consent in hindi | Section-13 B

आपसी सहमति से तलाक | Divorce By Mutual Consent in hindi

जव पति या पत्नी अपनी मर्जी से या आपसी सहमति से तलाक लेना चाहते है तो इस प्रक्रिया को आपसी सहमति से तलाक (Divorce By Mutual Consent) कहते है। 
 
अगर पति या पत्नी अपनी मर्जी से स्वंम एक दूसरे से तलाक (Divorce) लेना चाहते है तो ऐसी स्थति के लिए हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 13 वी समस्त प्रावधान करती हैै।
 
Hindu Marriage Act 1955 Section-13 B यह वताती है कि कव एक पति या पत्नी आपसी सहमति से तलाक Divorce by Mutual Consent कैसे पा या ले सकते है?
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Divorce By Mutual Consent  

Hindu Marriage act Setion-13 B in hindi

धारा 13 B वताती है कि दोनो पक्षकार यानी पति या पत्नी दोनो मिलकर तलाक के लिए जिला न्यायालय (District Court) या परिवार न्यायालय (Family Court) मे इस आधार पर तलाक (Divorce) की याचिका ला सकते हैै।
 
कि वह लगातार 1 वर्ष या उससे अधिक समय से एक दूसरे से अलग रह रहे है यहॉ यह ध्यान देने योग्य वात हैै।
 
कि कोई भी तलाक (Divorce) की याचिका विवाह के 1 वर्ष के अन्दर नही लाई जा सकेगी इस सम्बन्ध मे धारा 14 यह वताती हैै।
 
कि विवाह को हूये कम से कम 1 वर्ष पूर्ण होना आवश्यक है और इस 1 वर्ष के अन्दर पति पत्नी एक दूसरे के साथ न रहे हो तव ऐसी स्थति मे धारा 13 वी कहती हैै।
 
कि पति या पत्नी तव आपसी सहमति से तलाक की याचिका ला सकते है जव पति पत्नी एक वर्ष या उससे अधिक समय से अलग रह रहे हो और वह एक साथ नही रह सके हो
 
तथा वह इस वात के लिए आपस मे सहमत हो कि विवाह समाप्त कर दिया जाए धारा 13 वी यह भी वताती हैै।
 
कि ऐसी याचिका दाखिल होने की तारिख से 6 महीने के वाद या उस तारिख से 18 महीने के भीतर दोनो पक्षकारो मे से यानी पति या पत्नी मे से किसी के द्वारा याचिका वापस न ली गई हो

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तो कोर्ट दोनो पक्षकारो को सुनने के वाद और ऐसी जांच करने के वाद जो वह आवश्यक समझे तलाक (Divorce) की डिक्री पारित कर सकता हैै।
 
और Court के द्वारा ऐसी डिक्री पारित करने की दिनाक से विवाह समाप्त या विघटित समझा जाता हैै।
 
आसान शब्दो मे कहें तो जव पति पत्नी द्वारा आपसी सहमति से Court मे याचिका दायर की जाति है उसके वाद कोर्ट पति पत्नी को 6 महिने का समय देती हैै।
 
ताकी अगर पति पत्नी चाहे तो इन 6 माह के अन्दर अपनी तलाक की याचिका वापस ले सके क्योकि हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 13 वी का मुख्य उद्देश्य विवाह को तोडना नही हैै।
 
न्यायालय यह चाहती है कि किसी तरह यदि सम्भव हो सके तो यह विवाह समाप्त न हो जिस कारण न्यायालय Court पति पत्नी को फिर विचार करने के लिए कम से कम 6 माह का समय देती हैै।
 
यदि इन 6 माह के अन्दर पति पत्नी आपसी सहमति से दायर की गई तलाक (Divorce) की याचिका वापस नही लेते है तो Court ऐसे विवाह को आवश्यक जॉच के वाद समाप्त कर देती हैै।
 
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इस प्रकार लिये गये तलाक के वाद पत्नी चाहे तो पति से भरण पोषण प्राप्त कर सकती है या तलाक (Divorce) लेते समय एक मुश्त धनराशी के रूप पे अपने भरण पोषण हेतु एक वार मे ही धनराशी प्राप्त कर सकती है

हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 15 Hindu Marriage Act 1955 Section-15

यह वताती है कि जव विवाह तलाक द्वारा समाप्त कर दिया जाये तव या तो तलाक (Divorce) की डिक्री के विरूद्व या खिलाफ अपील दायर करने का कोई अधिकार न वचा हो और यदि ऐसा कोई अधिकार है
 
तो अपील दायर करने के समय का अवसान अपील पेश करने के विना हो गया है या अपील की गई हो लेकिन खारिज कर दी गई हो तव विवाह में किसी पाछकार के लिए विवाह करना विधि पूर्ण होगाै।
 
आसान शब्दों में कहे तो 
 
तलाक के बाद पति-पत्नी में से कोई तब शादी कर सकता है जब ऐसे तलाक (Divorce) के आदेश के खिलाफ कोई अपील न की गयी हो।  
 
या अपील करने का कोई अधिकार है भी तो अपील करने का समय पूरा हो चुका हो।  और कोई अपील दायर न की गयी हो
 
या ऐसी अपील डाली गयी हो लेकिन ख़ारिज हो गयी हो तब पति या पत्नी में से कोई भी दूसरा विवाह कर सकते है।
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