धारा 5-9-11-12 हिन्दू विवाह अधिनियम 1955

धारा 5-9-11-12 हिन्दू विवाह अधिनियम 1955

Hindu Marriage Act 1955 एक हिन्दू पुरूष या महिला के विवाह समबन्धित अधिकारो एंव दायित्यो तथा विवाह के लिए उनकी सक्षमता ,तलाक , तथा हिन्दू समाज के विवाह सम्बन्धि विधी के वारे मे अवगत कराता है। 
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Section 5-9-11-12 of Hindu Marriage Act
Hindu Marriage Act 1955 18 मई 1955 मे पारित हुआ धारा 5  हिन्दू विवाह धारा 5 एक हिन्दू पुरूष या महिला की विवाह हेतु सक्षमता को दर्षाता हैै। Hindu Marriage Act 1955 मे कुल 30 धाराए है जिनमे से मुख्य धाराये निम्न है। 

सरल भाषा पे कहे तो 

 एक हिन्दू पुरूष या एक हिन्दू महिला कव विवाह योग्य माने जायेगे धारा 5 इसी वारे मे वताती है इस प्रकार धारा 5 के अनुसार वह व्यक्ति विवाह योग्य है।
 
1. जिसका पति या पत्नी विवाह के समय जीवित न हो और विवाह के समय कोई भी व्यक्ति महिला हो या पुरूष किसी दिमागी वीमारी या पागलपन से ग्रसित न हो।
 
2. और विवाह के समय पुरूष की आयू 24 वर्ष तथा महिला की आयू 18 वर्ष होनी अनिवार्य है। 
 
3. कोई भी हिन्दू व्यक्ति अपनी ही नातेदारी यानी घर सम्वम्धी लोगो से तव तक विवाह नही कर सकता जव तक उनके यहॉ ऐसी कोई प्रथा न हो।  

Section- 5 of  Hindu Marriage Act 1955 in hindi

इस तरह धारा 5 मे दी गई सारी प्रक्रिया पूरी होना वहुत आवश्यक है। अगर कोई व्यक्ति धारा 5 मे वताई गई प्रक्रिया के पूर्ण न होने के वावजूद भी अगर विवाह कर लेता है। 
 
तव इस प्रकार किया गया विवाह Hindu Marriage Act 1955 की धारा 11 और 12 के आधार पर शून्य विवाह या शून्यकरणीय माना जायेगा ।

Section- 9 of  Hindu Marriage Act 1955 in hindi

Hindu Marriage Act 1955 की धारा 9 इस प्रकार का प्रावधान करती है कि अगर विवाह के वाद पति या पत्नी मे से कोई एक विना किसी उचित कारण के एक दूसरे से अलग रहना शुरू कर दे या जानवूझ कर पति अपनी पत्नी को या पत्नी अपने पति को छोड कर अलग रहने लगे।
 
जैसे आपतौर पर देखा जाता है कि घर मे विवाद होने पर पत्नी अपने मायके चली जाती है या पति अपनी पत्नी को छोड कर कहीं और रहने लगता है। 
 
तव धारा 9 जो ऐसे हिन्दू पति या पत्नी के सम्बन्ध मे वताती है कि जव इस तरह पत्नी या पति मे से कोई विना किसी उचित कारण के अलग रहने लगे। 
 
तव उपमे से कोई एक व्यक्ति न्यायालय मे अपने पति या पत्नी को वापस वुलाने के लिये याचिका दायर कर सकता है और न्यायालय से निवेदन कर सकता है। 
 
कि उसकी पत्नी या पति विना किसी उचित कारण के उससे अलग रह रहे है ऐसी स्थति मे न्यायालय उस व्यक्ति को आदेशित करे
 
कि वह दुवारा आकर अपने वैवाहिक जीवन का सामान्य रूप से निर्वाह करे इस तरह वापिस वुलाने की याचिका को दाम्पत्याधिकारो का प्रत्यास्थपन कहते है । 
 
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Section- 11 of  Hindu Marriage Act 1955 in hindi

Hindu Marriage Act 1955 धारा 11 वताती है कि धारा 5 मे दी गई किन शर्तो या प्रक्रियाओ के पूरे या पूर्ण न हाने पर विवाह शून्य होता है। शुन्य का मतलव यानी इस प्रकार किया गया विवाह पूर्ण रूप से अवैध माना जाएगा 
 
धारा 5 की कुछ शर्तो के वारे मे हम पहले वात कर चुके है धारा 11 के अनुसार हिन्दु विवाह अधिनियम की धारा 5 के खण्ड 1 , 4 ,  5 मे दी गई शर्तो के उल्लगन पर विवाह पूरी तरह से शून्य विवाह होता है। या न्यायालय द्वारा घोषित किया जा सकता है। 
 
दाहरण के लिए मान लीजिए एक पुरूष जिसकी पहली पत्नी जीवित होते हूए भी किसी दूसरी महिला से विवाह कर लेता है। 
 
तो धारा 5 मे दी गई एक शर्त यही है कि विवाह के समय किसी भी व्यक्ति का पति या पत्नी जिवित न हो लेकिन फिर भी वह व्यक्ति अपनी पत्नी या पति के जीवित रहते हुए भी विवाह कर लेता है तव धारा 11 के आधार पर इस प्रकार किया गया विवाह शून्य होगा। 
 
क्योकि यह धारा 5 मे दी गई पहली शर्त को पूरा नही करता है इसी प्रकार धारा 5 मे दी गई चौथी और पांचवी शर्त के पूरा न होने पर धारा 11 ऐसे विवाह को शून्य वना देती है। 

Section- 12 of  Hindu Marriage Act 1955 in hindi 

Hindu Marriage Act 1955 धारा 12 हमे शून्यकरणीय विवाह के वारे मे वताती है धारा 12 वताती है कि किन परिस्थितियो मे विवाह शून्यकरणीय घोशित किया जा सकता है धारा 12 वताती है। 
 
1. कि Hindu Marriage Act 1955 के पारित होने से पहले हुआ विवाह और Hindu Marriage Act 1955 लागू होने के वाद मे हुआ विवाह धारा 12 के अन्तर्गत शुन्यकरणीय घोषित किया जा सकता है
 
2. अगर विवाह के पश्चात अगर पति या पत्नी मे से किसी की नपुंसकता के कारण सम्भोग न हूआ हो या हिन्दु विवाह अधिनियम (Hindu Marriage Act 1955) की  
 
धारा 5 में खण्ड 2 मे वताई गई शर्तो का उल्लगन हुआ हो
 
1. धारा 5 मे दी गई दूसरी शर्त पति या पत्नी मे से किसी व्यक्ति के दिमागी रूप से स्वस्थ न होने के वारे मे वताती है इसी तरह धारा 12 का खण्ड ग वताता है 
 
2. कि अगर वाल विवाह निरोधक संशोधन अधिनियम 1978 के पारित होने के पहले अगर किसी वालक के संरक्षक की सहमति वलपूर्वक या कपट से प्राप्त की गई थी
 
3. तो ऐसा विवाह भी शून्यकरणीय घोषित कर दिया जाऐगा और 12 का खण्ड घ वताता है कि अगर विवाह के समय पत्नी किसी अन्य व्यक्ति से गर्भवति थी। 
 
4. तव भी पति के द्वारा याचिका दायर करके विवाह को शून्य घोषित कराया जा सकता है 

सुनील कुमार वनाम् मन्टो कुमारी

उदाहरण जहॉ पत्नी ने विवाह के 5 महीने 6 दिन के वाद वच्चे को जन्म दिया डी0 एन0 ए0 रिपोर्ट पति को वच्चे का जैविक पिता नही वताती थी
 
न्यायालय ने ऐसी स्थति मे विवाह को शून्यकरणीय घोषित कर दिया
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