गुरमीत सिंह भाटिया बनाम किरन कान्त राबिन्सन

गुरमीत सिंह भाटिया बनाम किरन कान्त राबिन्सन

(उच्चतम न्यायालय) 
सिविल अपील संख्या 5522 एवं 5523 वर्ष 2019
17 जुलाई, 2019 को विनिश्चित 

गुरमीत सिंह भाटिया
बनाम
किरन कान्त राबिन्सन एवं अन्य

निर्णय

एम० आर० शाह, न्यायमूर्ति.-छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय, बिलासपुर द्वारा रिट याचिका संख्या 856/2012 में पारित किये गये दिनांक 3.7.2013 के निर्णय तथा आदेश और रिट याचिका संख्या 856/2012 में पुनर्विलोकन याचिका संख्या 169/2013 में पारित किये गये दिनांक 5.8.2013 के आदेश, जिसके द्वारा उच्च न्यायालय ने मूल वादीगण द्वारा प्रस्तुत की गयी उक्त रिट याचिका को अनुज्ञात किया है और वर्तमान प्रत्युत्तरदातागण संख्या 2 और 3-मूल वादीगण द्वारा दाखिल किये गये वाद के आवश्यक पक्षकार के रूप में उसे पक्षकार बनाने के लिये वर्तमान अपीलार्थी द्वारा प्रस्तुत किये गये आवेदन को अनुज्ञात करते हुये विद्वान विचारण न्यायालय द्वारा पारित किये गये आदेश को अभिखण्डित तथा अपास्त किया है, से व्यथित और असन्तुष्ट महसूस करते हुये मूल आवेदक-अपीलार्थी ने वर्तमान अपीलों को प्रस्तुत किया है।

2. इन अपीलों को अग्रसर करने वाले मामले के तथ्य संक्षेप में निम्न प्रकार से हैं :

वर्तमान प्रत्युत्तरदातागण संख्या 2 और 3-मूल वादीगण विद्वान चतुर्थ अपर जिला न्यायाधीश, बिलासपुर के न्यायालय में प्रत्युत्तरदाता संख्या 1-मूल प्रतिवादी संख्या 1 द्वारा निष्पादित किये गये दिनांक 3.5.2005 के विक्रय के करार/संविदा के विनिर्दिष्ट अनुपालन के लिये वर्तमान प्रत्युत्तरदाता संख्या 1-मूल प्रतिवादी के विरुद्ध वाद दाखिल किया गया है।

यह कि पूर्वोक्त वाद के लम्बित रहने के दौरान और वर्तमान प्रत्युत्तरदाता संख्या 1-मूल प्रतिवादी संख्या 1-मूल स्वामी के विरुद्ध वादग्रस्त सम्पत्ति को अन्यसंक्रामित न करने के लिये व्यादेश के बावजूद वर्तमान प्रत्युत्तरदाता संख्या 1-मूल प्रतिवादी संख्या 1 ने दिनांक 10.7.2008 के विक्रयविलेख के माध्यम से वर्तमान अपीलार्थी के पक्ष में विक्रय-विलेख निष्पादित किया था। वर्तमान अपीलार्थीक्रेता, जो वाद के लम्बित रहने के दौरान वादग्रस्त सम्पत्ति को क्रय किया था, वाद में प्रतिवादी के रूप में पक्षकार बनाये जाने के लिये सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश I, नियम 10 के अधीन लम्बित वाद में आवेदन दाखिल किया था। वर्तमान अपीलार्थी की ओर से मामला यह था कि वह वादग्रस्त सम्पत्ति को क्रय किया था और वाद का आवश्यक और उचित पक्षकार है, क्योंकि उसका वादग्रस्त सम्पत्ति में प्रत्यक्ष हित है। यह कि दिनांक 5.11.2012 के आदेश द्वारा विद्वान विचारण न्यायालय ने उक्त आवेदन को अनुज्ञात किया था और मूल वादीगण को वाद में प्रतिवादी के रूप में अपीलार्थी को शामिल करने के लिये निर्देशित किया था।

2.1. आवेदन को अनुज्ञात करते हुये और मूल वादीगण-वर्तमान प्रत्युत्तरदातागण संख्या 2 एवं 3 द्वारा दाखिल किये गये वाद में प्रतिवादी पक्षकार के रूप में जोड़े जाने के लिये वर्तमान अपीलार्थी को अनुज्ञात करते हुये विचारण न्यायालय द्वारा पारित किये गये दिनांक 5.11.2012 के आदेश से व्यथित और असंतुष्ट महसूस करते हुये वर्तमान प्रत्युत्तरदातागण संख्या 2 और 3 छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के समक्ष रिट याचिका संख्या 856/2012 दाखिल किये थे। 

दिनांक 3.7.2013 के आक्षेपित निर्णय तथा आदेश द्वारा उच्च न्यायालय ने उक्त रिट याचिका को अनुज्ञात किया है और यह अभिनिर्धारित करते हुये वर्तमान अपीलार्थी द्वारा प्रस्तुत किये गये पक्षकार बनाये जाने के आवेदन को अनुज्ञात करते हुये विद्वान विचारण न्यायालय द्वारा पारित किये गये आदेश को अभिखण्डित तथा अपास्त किया है कि जहां तक मूल प्रतिवादीगण के विरुद्ध दावा किये गये अनुतोष का सम्बन्ध है, चूंकि वर्तमान अपीलार्थी के विरुद्ध किसी अनुतोष का दावा नहीं किया गया है, इसलिये अपीलार्थी को आवश्यक अथवा औपचारिक पक्षकार होना नहीं कहा जा सकता है। यह कि इसके पश्चात् अपीलार्थी ने पुनर्विलोकन आवेदन प्रस्तुत किया था, जिसे खारिज किया गया था। इसलिये विशेष अनुमति याचिकाओं के माध्यम से वर्तमान अपीलें प्रस्तुत की गयी हैं।

3. अपीलार्थी की ओर से विद्वान वरिष्ठ अधिवक्ता श्री प्रशान्तो चन्द्र सेन उपसंजात हुये हैं और मूल वादीगण की ओर से विद्वान अधिवक्ता श्री एम० शोएब आलम उपसंजात हुये हैं।

3.1. अपीलार्थी की ओर से उपसंजात होने वाले विद्वान वरिष्ठ अधिवक्ता ने दृढ़तापूर्वक यह तर्क किया है कि जब एक बार विद्वान विचारण न्यायालय ने यह अभिनिर्धारित करते हये सिविल प्रक्रिया संहिता के
आदशा, नियम 10 के अधीन वर्तमान अपीलार्थी द्वारा प्रस्तुत किये गये पक्षकार बनाने के आवेदन को अनुज्ञात किया था कि अपीलार्थी आवश्यक और उचित पक्षकार नहीं है, तब उच्च न्यायालय को भारत के संविधान के अनुच्छेद 227 के अधीन शक्तियों के प्रयोग में उसमें हस्तक्षेप नहीं करना चाहिये था।

3.2. अपीलार्थी की ओर से उपसंजात होने वाले विद्वान वरिष्ठ अधिवक्ता द्वारा दृढ़तापूर्वक यह तर्क दिया गया है कि अपीलार्थी ने वादग्रस्त सम्पत्ति को उसी विक्रेता से क्रय किया है और वास्तव में, अपीलाथी विक्रय के करार का पहला धारक था और अपीलार्थी के हित को संरक्षित करने के लिये था, इसलिये अपीलार्थी आवश्यक तथा उचित पक्षकार है। यह तर्क दिया गया है कि इसलिये, विद्वान विचारण न्यायालय ने अपीलार्थी द्वारा प्रस्तुत किये गये पक्षकार बनाने के आवेदन को सही रूप में अनुज्ञात किया था।

3.3. उक्त तर्क करते हुये और राबिन रामजीभाई पटेल बनाम आनन्दीबाई रामा उर्फ राजाराम पवार, (2018) 15 एस सी सी 614, के मामले में इस न्यायालय के निर्णय और श्री स्वास्तिक डेवलपर्स बनाम साकेत कुमार जैन, 2014 (2) महा एल जे 968, के मामले में बम्बई उच्च न्यायालय के निर्णय पर विश्वास व्यक्त करते हुये वर्तमान अपीलों को अनुज्ञात करने तथा उच्च न्यायालय द्वारा पारित किये गये आक्षेपित निर्णयों एवं आदेशों को अभिखण्डित और अपास्त करने तथा विद्वान विचारण न्यायालय द्वारा पारित किये गये आदेश को प्रत्यावर्तित करने के लिये प्रार्थना की गयी है।

4. वर्तमान अपीलों का मूल वादीगण की ओर से उपसंजात होने वाले विद्वान अधिवक्ता श्री एम० शोएब आलम द्वारा दृढ़तापूर्वक विरोध किया गया है। यह दृढतापूर्वक तर्क किया गया है कि वास्तव में, अपीलार्थी ने वाद के लम्बित रहने के दौरान और वह भी विद्वान विचारण न्यायालय द्वारा मंजर किये गये व्यादेश के उल्लंघन में वादग्रस्त सम्पत्ति को क्रय किया था। 

यह तर्क किया गया है कि ऐसा होने पर, विक्रय का पर्ववर्ती करार, जिस पर अपीलार्थी द्वारा विश्वास व्यक्त किया गया है, गढ़ा गया और कूटरचित है। यह तर्क किया गया है कि किसी भी स्थिति में अपीलार्थी को उस विक्रय के करार/संविदा, जिसका अपीलार्थी पक्षकार नहीं है, के विनिर्दिष्ट अनुपालन के लिये मूल वादीगण के द्वारा दाखिल किये गये वाद में प्रतिवादी के रूप में पक्षकार नहीं बनाया जा सकता है। यह तर्क किया गया है कि मूल वादीगण को वाद का अधिकार है और उनकी सम्मति के बिना किसी व्यक्ति को प्रतिवादी के रूप में पक्षकार बनाये जाने के लिये अनुज्ञात नहीं किया जा सकता है।

4.1. यह दृढ़तापूर्वक तर्क किया गया है कि ऐसा होने पर मामले में अन्तर्ग्रस्त विवाद्यक, कस्तूरी बनाम अय्यामपेरूमल, (2005) 6 एस सी सी 733 : 2005 (2) एस सी सी डी 971 (एस सी), के मामले में इस न्यायालय के विनिश्चय की दृष्टि में अपीलार्थी के विरुद्ध पूर्णतया आच्छादित है।

4.2. जहां तक राबिन रामजीभाई पटेल (उक्त) के मामले में इस न्यायालय के निर्णय के साथ ही साथ श्री स्वास्तिक डेवलपर्स (उक्त) के वाद में, बम्बई उच्च न्यायालय के निर्णय पर अपीलार्थी की ओर से उपसंजात होने वाले विद्वान वरिष्ठ अधिवक्ता द्वारा विश्वास व्यक्त करने का सम्बन्ध है, मूल वादीगण की ओर से उपसंजात होने वाले विद्वान अधिवक्ता श्री एम० शोएब आलम द्वारा दृढ़तापूर्वक यह तर्क किया गया है कि उक्त निर्णय वर्तमान मामले के तथ्यों में प्रयोज्य नहीं होंगे। यह तर्क किया गया है कि दोनों उपरोक्त मामलों में मूल वादी द्वारा पश्चात्वर्ती क्रेता, जो वादों के लम्बित रहने के दौरान सम्पत्ति को क्रय किया था, को पक्षकार बनाने के लिये यह आवेदन था। 

यह तर्क किया गया है कि जैसा कि कस्तूरी (उक्त) के वाद में इस न्यायालय द्वारा अभिनिर्धारित किया गया है, विशेष व्यक्ति/व्यक्तियों को प्रतिवादी/प्रतिवादीगण के रूप में पक्षकार बनाना वादी/वादीगण का कर्तव्य है और यदि वह/वे नहीं जोड़ता है/जोड़ते हैं, तब यह वादी/वादीगण के जोखिम पर होगा। अग्रेतर यह तर्क किया गया है कि वादी को विशेष रूप में उस समय, जब यह संविदा का पक्षकार न हो, तब वादी की इच्छा के विरुद्ध किसी अन्य व्यक्ति को पक्षकार बनाने के लिये विवश नहीं किया जा सकता है। यह तर्क किया गया है कि इसलिये, दोनों पूर्वोक्त निर्णय, जिन पर अपीलार्थी की ओर से उपसंजात होने वाले विद्वान वरिष्ठ अधिवक्ता द्वारा विश्वास व्यक्त किया गया है, वर्तमान मामले के तथ्यों में लागू नहीं होंगे। यह तर्क किया गया है कि ऐसा होने पर, कस्तूरी (उक्त) के मामले में इस न्यायालय का विनिश्चय विवाद्यक को आच्छादित करता है और वह स्पष्ट रूप में वर्तमान मामले के तथ्यों में प्रयोज्य होगा।

4.3. उक्त तर्क करते हये और कस्तूरी (उक्त) के वाद में इस न्यायालय के निर्णय पर विश्वास व्यक्त करते हुये वर्तमान अपीलों को खारिज करने की प्रार्थना की गयी है।

5. हमने क्रमश: पक्षकारों के विद्वान अधिवक्तागण को विस्तारपूर्वक सुन लिया है। 

5.1. प्रारम्भ में यह उल्लेख किया जाना आवश्यक है कि मूल वादीगण वादग्रस्त सम्पत्ति के सम्बन्ध में दिनांक 3.5.2005 के विक्रय के करार के विनिर्दिष्ट अनुपालन के लिये मूल स्वामी-विक्रेता-मूल प्रतिवादी सख्या 1 के विरुद्ध वाद दाखिल किये थे। यह स्वीकृत स्थिति है कि जहां तक दिनांक 3.5.2005 के विक्रय क करार का सम्बन्ध है, जिसके विनिर्दिष्ट अनुपालन की मांग की गयी है, अपीलार्थी विक्रय के उक्त करार का पक्षकार नहीं है। 

यह प्रतीत होता है कि पर्वोक्त वाद के लम्बित रहने के दौरान और यद्यपि मूल स्वामीविक्रता के विरुद्ध वादग्रस्त सम्पत्ति को अन्तरित करने तथा अन्यसंक्रामित करने से अवरुद्ध करते हुये व्यादेश था, फिर भी विक्रेता ने दिनांक 10.7.2008 के विक्रय-विलेख द्वारा अपीलार्थी के पक्ष में विक्रय-विलेख निष्पादित किया था। लगभग 4 वर्ष की अवधि के पश्चात् अपीलार्थी ने प्रतिवादी के रूप में उसे पक्षकार बनान के लिये सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश L नियम 10 के अधीन विद्वान विचारण न्यायालय के समक्ष आवदन दाखिल किया था। अपीलार्थी ने उक्त विक्रय-विलेख के साथ ही साथ मूल विक्रेता द्वारा निष्पादित किये जाने के लिये अभिकथित दिनांक 31.3.2003 के विक्रय के करार के आधार पर अधिकार का दावा

किया था। उक्त आवेदन-पत्र का मूल वादीगण द्वारा विरोध किया गया था। विद्वान विचारण न्यायालय ने मूल वादीगण के द्वारा विरोध के बावजूद उक्त आवेदन को अनुज्ञात किया था, जिसे उच्च न्यायालय द्वारा आक्षेपित तथा आदेश के माध्यम से अपास्त किया गया है। 

इस प्रकार यह मूल वादीगण तथा मूल प्रतिवादी संख्या 1 (विक्रेता) के बीच विक्रय विक्रय के करार के लिये पर-पक्षकार के द्वारा सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 1, नियम 10 के अधीन आवेदन था और पक्षकार बनाने के उक्त आवेदन का मूल वादीगण द्वारा विरोध किया गया है/था।  संक्षिप्त प्रश्न, जो इस न्यायालय के समक्ष विचारण के लिये पछा गया है, यह है कि क्या मटीगण को उसकी इच्छा के विरुद्ध और विशेष रूप से ऐसे व्यक्ति के सम्बन्ध में, जिसके विरुद्ध उसके द्वारा किसी अनुतोष का दावा न किया गया हो, विनिर्दिष्ट अनुपालन के लिये वाद में पक्षकार बनाने के लिये विवश किया जा सकता है?

कस्तरी के वाद (उक्त) में इस न्यायालय के द्वारा विचार किये जाने के लिये समान प्रश्न आया था और इस सिद्धान्त को लागू करते हुये कि वादी को मामले के समान तथ्यों तथा परिस्थितियों में वाद का अधिकार प्राप्त है, इस न्यायालय ने यह संप्रेक्षण तथा अभिनिर्धारित किया था कि किसी ऐसे पक्षकार को जिसे बाटी दारा दाखिल किये गये वाद में पक्षकार न बनाया गया हो, 

जोडने के लिये सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश नियम 10 का आश्रय लेने के लिये न्यायालय की अधिकारिता का प्रश्न तब तक उद्धृत नहीं होगा, जब तक जोडे जाने के लिये प्रस्तावित पक्षकार का वाद में अन्तर्ग्रस्त विवाद में प्रत्यक्ष तथा विधिक हित न हो। अग्रेतर इस न्यायालय द्वारा यह सप्रेक्षण तथा अभिनिर्धारित किया गया है कि इस प्रश्न को कि आवश्यक पक्षकार कौन है, अवधारित करने के लिये दो परीक्षणों का समाधान किया जाना है। वे परीक्षण हैं-

(1) ऐसे पक्षकार के विरुद्ध कार्यवाही में अन्तर्ग्रस्त विवाद के सम्बन्ध में किसी अनुतोष का अधिकार होना चाहिये;

(2) ऐसे पक्षकार के अभाव में कोई प्रभावी डिक्री पारित नहीं की जा सकती है। अग्रेतर यह संप्रेक्षण तथा अभिनिर्धारित किया गया है कि विनिर्दिष्ट अनुपालन के लिये वाद में, पहला परीक्षण जिसे बनाया जा सकता है, यह अवधारित करने के लिये है कि क्या पक्षकार आवश्यक पक्षकार है, आवश्यक पक्षकार होने का दावा करने वाले पक्षकार के विरुद्ध विक्रय की संविदा के विनिर्दिष्ट अनुपालन के लिये कार्यवाही में अन्तर्ग्रस्त उसी विषयवस्तु से सम्बन्धित उसी अनुतोष का अधिकार होना चाहिये। 

इस न्यायालय द्वारा अग्रेतर यह संप्रेक्षण तथा अभिनिर्धारित किया गया है कि संविदा के विनिर्दिष्ट अनुपालन के लिये वाद में उचित पक्षकार ऐसा पक्षकार होता है, जिसकी उपस्थिति वाद में अन्तर्ग्रस्त विवाद्यक को न्यायनिर्णीत करने के लिये आवश्यक होती है। अग्रेतर यह संप्रेक्षण तथा अभिनिर्धारित किया गया है कि विक्रेता के हक के प्रतिकूल, न कि संविदा के आधार पर, स्वतन्त्र हक तथा कब्जे का दावा करने वाले पक्षकार उचित पक्षकार नहीं होते हैं 

और यदि ऐसे पक्षकार को वाद में पक्षकार बनाया जाता है, तब विनिर्दिष्ट अनुपालन के लिये वाद की व्याप्ति हक तथा कब्जे के लिये वाद तक विस्तारित होगी, जो अननुज्ञेय है। अग्रेतर यह संप्रेक्षण तथा अभिनिर्धारित किया गया था कि पर-पक्षकार अथवा अजनबी व्यक्ति को मात्र यह जानने के लिये कि संविदाकृत सम्पत्ति का कब्जा कौन रखे हुय है अथवा वादों की बहलता को परिवर्जित करने के लिये विनिर्दिष्ट अनुपालन के लिये वाद में नहीं जोड़ा जा सकता है। अग्रेतर इस न्यायालय द्वारा यह संप्रेक्षण तथा अभिनिर्धारित किया गया है कि पर-पक्षकार अथवा संविदा के विनिर्दिष्ट व्यक्ति को इसलिये नहीं जोड़ा जा सकता है, जिससे कि वाद के स्वरूप को भिन्न स्वरूप में वाद में परिवर्तित किया जा सके। पैरा 15 और 16 में इस न्यायालय ने निम्न प्रकार संप्रेक्षण तथा अभिनिर्धारित किया था:

    "15. जैसा कि एतस्मिनपर्व विवेचन किया गया है, क्या प्रत्युत्तरदातागण संख्या 1 एवं 4 से 11 अचत पक्षकार थे अथवा नहीं, इस प्रश्न को निर्णीत करने के लिये शासित करने वाला सिद्धान्त यह होगा कि न्यायालय के समक्ष प्रत्युत्तरदातागण संख्या 1 एवं 4 से 11 की उपस्थिति वाद में अन्तर्ग्रस्त सभी प्रश्ना को न्यायनिर्णीत तथा निस्तारित करने के लिये प्रभावी रूप में तथा पूर्ण रूप में समर्थ बनाने के लिये आवश्यक होगी। जैसा कि एतस्मिनपर्व उल्लेख किया गया है, विक्रय की संविदा के विनिदिष्ट अनुपालन के लिये वाद में निर्णीत किया जाने वाला विवाद्यक अपीलार्थी तथा प्रत्युत्तरदातागण संख्या 2 एव 3 के बीच की गयी संविदा की प्रवर्तनीयता है 

और क्या संविदा को अपीलार्थी और प्रत्युत्तरदातागण सख्या 2 एवं 3 के द्वारा संविदाकत सम्पत्ति के विक्रय के लिये निष्पादित किया गया था, क्या वादीगण सावदा के अपने भाग का अनपालन करने के लिये तैयार और रजामन्द थे और क्या अपीलार्थी प्रत्युत्तरदातागण संख्या 2 एवं 3 के विरुद्ध विक्रय की संविदा के विनिर्दिष्ट अनुपालन की डिक्री का हकदार है। यह स्वीकृत स्थिति है कि प्रत्युत्तरदातागण संख्या 1 एवं 4 से 11 उस संविदा के बल पर बाद म उन्हें शामिल करने की मांग नहीं किये थे, जिसके सम्बन्ध में विक्रय की संविदा के विनिर्दिन अनुपालन के लिये वाद दाखिल किया गया था।

स्वीकृत रूप में वे अपने दावे को संविदाकृत सम्पत्ति के स्वतन्त्र हक तथा कब्जे पर आधारित किये थे। इसलिये यह स्पष्ट है, जैसा कि एतस्मिन्पश्चात उल्लेख किया गया है कि यदि प्रत्यत्तरदातागण संख्या 1 एवं 4 से 11 को वाद में जोड़ा जाता है अथवा पक्षकार बनाया जाता है, तब विक्रय की संविदा के विनिर्दिष्ट अनुपालन के लिये वाद की व्याप्ति विनिर्दिष्ट अनुपालन के लिये वाद से हक और कब्जे के लिये वाद तक विस्तारित होगी. जो विधि का दृष्टिम य नहीं है। 

विजय प्रताप बनाम शम्भू शरण सिन्हा, (1996)10 एस सी सी 53, के मामले में, इस गायालय ने वहा विचार अपनाया था, जो हमारे द्वारा इस निर्णय में अपनाया जा रहा है जैसा कि ऊपर विवेचित है। इस न्यायालय ने उस निर्णय में स्पष्ट रूप में यह अभिनिर्धारित किया था कि संविदा के अजनबी व्यक्ति के वादग्रस्त सम्पत्ति में अधिकार, हक तथा हित को निर्णीत करना संविदा के विनिर्दिष्ट पालन के लिये वाद की व्याप्ति के परे है और उसे नियमित हक वाद में परिवर्तित नहीं किया जा ना है। इसलिये हमारी राय में पर-पक्षकार अथवा संविदा के अजनबी व्यक्ति को शामिल नहीं किया सकता है. जिससे कि वाद के एक स्वरूप को भिन्न स्वरूप के वाद में परिवर्तित किया जाये। 

जैसा कि ऊपर विवेचन किया गया है, यदि प्रत्युत्तरदातागण संख्या 2 एवं 3 के विरुद्ध तथा अपीलार्थी के पक्ष में संविदाकत सम्पत्ति के सम्बन्ध में विक्रय की संविदा के विनिर्दिष्ट अनुपालन के लिये कोई डिक्री पारित की जाती है, तब डिक्री, जो उक्त वाद में पारित की जायेगी, स्पष्ट रूप में प्रत्युत्तरदातागण संख्या 1 एवं 4 से 11 को आबद्ध नहीं बना सकती है। 

यह भी संप्रेक्षण किया जा सकता है कि यदि अपीलार्थी प्रत्यत्तरदातागण संख्या 2 एवं 3 के विरुद्ध संविदाकृत सम्पत्ति के विनिर्दिष्ट अनपालन के लिये डिक्री पाप्त करता है, तब न्यायालय अपीलार्थी के पक्ष में विक्रय के विलेख के निष्पादन को निर्देशित करेगा, यदि प्रत्युत्तरदातागण संख्या 2 एवं 3 के विक्रय-विलेख को निष्पादित करने और संविदाकत सम्पत्ति का कब्जा प्राप्त करने से इन्कार किया जाता है, तब उसे निष्पादन की डिक्री में रखा जाना है। जैसा कि एतस्मिनपूर्व उल्लेख किया गया है, चूंकि प्रत्युत्तरदातागण संख्या 1 एवं 4 से 11 संविदाकृत सम्पत्ति के विक्रय के लिये संविदा के विनिर्दिष्ट अनुपालन हेतु वाद में पक्षकार नहीं थे, इसलिये ऐसे वाद में पारित की गयी डिक्री उन्हें आबद्ध नहीं बनायेगी और उस वाद में प्रत्युत्तरदातागण संख्या 1 एवं 4 से 11 को या तो सिविल प्रक्रिया संहिता के सुसंगत प्रावधानों का आश्रय, यदि वे उन्हें उपलब्ध हों, 

लेते हुये अपने कब्जे को संरक्षित करने के लिये निष्पादन को अवरुद्ध करने या अपीलार्थी अथवा प्रत्युत्तरदाता संख्या 3 के विरुद्ध हक तथा कब्जे की घोषणा के लिये स्वतन्त्र वाद दाखिल करने की स्वतन्त्रता प्राप्त होगी। दूसरी तरफ यदि अपीलार्थी के पक्ष में डिक्री पारित की जाती है और विक्रय-विलेख निष्पादित किया जाता है, तब प्रत्युत्तरदातागण संख्या 1 एवं 4 से 11 को संविदा के अजनबी व्यक्ति होने के कारण कब्जा लेने के लिये वाद दाखिल करना है, यदि वे डिक्रीत सम्पत्ति के कब्जे में हों।

    "16. इसके अलावा सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश1 के नियम 10 के उपनियम (2) में प्रयुक्त अभिव्यक्ति "वाद में अन्तर्ग्रस्त सभी प्रश्नों" के स्पष्ट वाचन से यह पर्याप्त रूप में स्पष्ट है कि विधान मण्डल स्पष्ट रूप में इस बात के लिये तात्पर्यित है कि वादकरण के पक्षकारों के बीच उठाये गये विवादों की केवल एक बार में जांच की जानी चाहिये अर्थात् अधिकार के सम्बन्ध में विवाद, जो प्रस्तुत किया गया हो तथा एक तरफ दावा किया गया और अन्य तरफ इन्कार किया गया अनुतोष, न कि ऐसे विवाद, जो स्वयं वादी-अपीलार्थी और प्रतिवादीगण के बीच उद्भूत हो सकते हैं 

अथवा वाद के पक्षकारों तथा पर-पक्षकार के बीच के प्रश्नों की केवल एक बार में जांच की जानी चाहिये। इसलिये हमारी राय में, न्यायालय को आनुषंगिक मामलों का न्यायनिर्णयन करने के लिये अनुज्ञात नहीं किया जा सकता है, जिससे कि विक्रय की संविदा के विनिर्दिष्ट अनुपालन के लिये वाद को एक तरफ वादी-अपीलार्थी और दूसरी तरफ प्रत्युत्तरदातागण संख्या 2 और 3 तथा प्रत्युत्तरदातागण संख्या 1 एवं 4 से 11 के बीच हक के लिये जटिल वाद में परिवर्तित किया जा सके। इसके अतिरिक्त यदि इसे अनुज्ञात किया जाता है, 

तब यह एसे जटिल वादकरण को अग्रसर करेगा, जिसके द्वारा गम्भीर प्रश्नों का विचारण और निर्णयन, जो वाद को व्याप्ति के पूर्ण रूप में परे हैं, की जांच की जानी होगी। चूंकि विक्रय की संविदा के विनिर्दिष्ट अनुपालन के लिये वाद की डिक्री, यदि पारित की जाती है, बिलकुल संविदाकृत सम्पत्ति के सम्बन्ध में प्रत्युत्तरदातागण संख्या 1 एवं 4 से 11 के अधिकार, हक तथा हित को प्रभावित नहीं कर सकती है और एतस्मिन्पूर्व किये गये ब्यौरेवार विवेचन की दृष्टि में प्रत्युत्तरदातागण संख्या 1 एवं 4 से 11 विक्रय की सविदा के विनिर्दिष्ट अनुपालन के लिये वर्तमान मामले में जोड़े जाने के लिये बिलकुल आवश्यक नहीं होंगे।" 

यह कि तत्पश्चात यथोक्त संप्रेक्षण करने तथा अभिनिर्धारित करने के पश्चात्, इस न्यायालय ने अग्रेतर यह सप्रेक्षण किया था कि इस सिदान्त की दष्टि में कि वादी, जो विक्रय की संविदा के विनिर्दिष्ट अनुपालन के वाद दाखिल किया हो, को वाद का अधिकार होता है, उसे ऐसे पक्षकारों को, जिनके विरुद्ध वह लड़ना नहीं चाहता है, जोड़ने के लिये तब तक विवश नहीं किया जा सकता है, जब तक यह विधि के नियम की बाध्यता न हो। 

कस्तूरी (उक्त) के वाद में पूर्वोक्त विनिश्चय में पर-पक्षकार की ओर से यह तर्क किया गया वे उस पर अपने स्वतन्त्र हक के आधार पर वादग्रस्त सम्पत्ति का कब्जा रखे हुये हैं और चूंकि वादी ने कब्जे के अनुतोष का भी दावा किया था और कब्जे के सम्बन्ध में विवाद पर-पक्षकार सहित पक्षकारों के बीच सामान्य है और इसलिये उसे स्वयं वाद में निस्तारित किया जा सकता है। 

पर-पक्षकार की ओर से यह और तर्क किया गया था कि वादों की बहुलता को परिवर्जित करने के लिये उन्हें प्रतिवादीगण पक्षकार के में शामिल करना उपयुक्त होगा। इस न्यायालय ने यह संप्रेक्षण करते हये पर्वोक्त तर्क को स्वीकार नहीं किया था कि मात्र यह जानने के लिये कि संविदाकृत सम्पत्ति का कौन कब्जा रखे हुये है, पर-पक्षकार अथवा संविदा के अजनबी व्यक्ति को विक्रय की संविदा के विनिर्दिष्ट अनुपालन के लिये वाद में नहीं जोड़ा जा सकता है,

क्योंकि वे आवश्यक पक्षकार नहीं हैं, क्योंकि संविदा के पक्षकार के विरुद्ध किसी अनुतोष के अधिकार की कोई समरूपता नहीं है। अग्रेतर यह संप्रेक्षण तथा अभिनिर्धारित किया गया है कि विक्रय की संविदा के विनिर्दिष्ट अनुपालन के लिये वाद में विवाद विक्रेता तथा उन व्यक्तियों, जिनके पक्ष में विक्रय का करार निष्पादित किया जाता है, के बीच होता है, 

केवल उसकी जांच की जानी होगी और न्यायालय को यह विनिश्चित करने की भी स्वंत्रता नहीं है कि क्या किसी अन्य पक्षकार ने संविदाकत सम्पत्ति का कोई हक तथा कब्जा अर्जित किया है। इस न्यायालय द्वारा पूर्वोक्त निर्णय में अग्रेतर यह संप्रेक्षण तथा अभिनिर्धारित किया गया है कि यदि वादी, जिसने अन्य व्यक्तियों (जो वाद के पक्षकार न हों और विक्रय के उस करार के भी पक्षकार न हों, जिसके लिये विनिर्दिष्ट अनुपालन के लिये डिक्री की मांग की गयी है) के द्वारा हक और कब्जे दावे की सूचना प्राप्त करने के पश्चात् भी विक्रय की संविदा के विनिर्दिष्ट अनुपालन के लिये वाद दाखिल किया हो, उन्हें लम्बित वाद में जोड़ना नहीं चाहता है, 

तब इसे केवल सदैव वादी के जोखिम पर किया जाता है, क्योंकि उसे ऐसे वाद में पक्षकार-प्रतिवादीगण के रूप में पर-पक्षकार को जोड़ने के लिये विवश नहीं किया जा सकता है। इस न्यायालय द्वारा पूर्वोक्त संप्रेक्षण इस सिद्धान्त पर विचार करते हुये किया गया है कि वादी को वाद का अधिकार है और उसे उन पक्षकारों को, जिनके विरुद्ध वह लड़ना नहीं चाहता है, को जोड़ने के लिये विवश नहीं किया जा सकता है, जब तक विधि के नियम की बाध्यता न हो। 

इसलिये, कस्तूरी (उक्त) के वाद में इस न्यायालय के निर्णय पर विचार करते हुये अपीलार्थी को मूल वादीगण तथा मूल प्रतिवादी संख्या 1 के बीच संविदा के विनिर्दिष्ट अनुपालन के लिये मूल वादीगण द्वारा दाखिल किये गये वाद में और उस संविदा, जिसका अपीलार्थी पक्षकार नहीं है, के विनिर्दिष्ट अनुपालन के लिये वाद में और वह भी वादीगण की इच्छा के विरुद्ध पक्षकार नहीं बनाया जा सकता है। वादीगण को किसी पक्षकार, जिसके विरुद्ध वह लड़ना नहीं चाहता है, को जोडने के लिये विवश नहीं किया जा सकता है। यदि वह ऐसा करता है, तब वह उस स्थिति में वह वादीगण के जोखिम पर करेगा।

6. अब जहां तक अपीलार्थी के विद्वान अधिवक्ता द्वारा विश्वास व्यक्त किये गये। राबिन रामजीभाई पटेल (उक्त) के वाद में इस न्यायालय के निर्णय और श्री स्वास्तिक डेवलपर्स (उक्त) के वाद में बम्बई उच्च न्यायालय के निर्णय पर व्यक्त किये गये विश्वास का सम्बन्ध है, पूर्वोक्त निर्णय वर्तमान मामले के तथ्यों में प्रयाज्य नहीं होंगे, 

क्योंकि दोनों पर्वोक्त मामलों में वह वादी था, जिसने पर-पक्षकार/पश्चात्वर्ती क्रेतागण, जो वादा के विक्रेता के अधीन हक का दावा किये थे, को पक्षकार बनाने के लिये आवेदन प्रस्तुत किया या स्थिति तब भिन्न होगी, जब वादी पक्षकार के रूप में पश्चात्वर्ती क्रेता को पक्षकार बनाने के लिये आवेदन प्रस्तुत करता है और जब वादी पक्षकार बनाने के लिये ऐसे आवेदन का विरोध करता है। यह पूर्वोत्त दोनों विनिश्चयों में और कस्तूरी (उक्त) के वाद में उच्चतम न्यायालय के विनिश्चय में सुभेदक लक्षण है।

7. उक्त की दृष्टि में और ऊपर कथित कारणों से, हम उच्च न्यायालय द्वारा अपनाये गये विचार से पूर्ण रूप में सहमत हैं। इस न्यायालय का कोई हस्तक्षेप आवश्यक नहीं है। अपीलार्थी को मूल वादीगण तथा मूल प्रातिवादी संख्या 1 के बीच संविदा के विनिर्दिष्ट अनुपालन के लिये वाद में वादीगण की इच्छा के विरुद्ध प्रातिवादी के रूप में पक्षकार नहीं बनाया जा सकता है। तदनुसार वर्तमान अपीलें खारिज हो जाती हैं। तथापि मामले के तथ्यों और परिस्थितियों में व्ययों के बारे में कोई आदेश नहीं होगा। 

नोट : [ ज्ञानी लॉ द्वारा उक्त आदेशो का हिंदी रूपांतरण सिर्फ जन-सामान्य व् अधिवक्ता गणों को हिंदी में उक्त आदेशों को समझने हेतु प्रस्तुत किये जातें है इनका प्रयोग किसी भी विधिक कार्यवाही में करना त्रुटिपूर्ण होगा ]

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