लीलाधर बनाम विजय कुमार 26 सितम्बर 2019

लीलाधर बनाम विजय कुमार 26 सितम्बर 2019

(उच्चतम न्यायालय)
सिविल अपील संख्या 7282 वर्ष 2009
26 सितम्बर, 2019 को विनिश्चित 

लीलाधर (मृत), द्वारा विधिक प्रतिनिधिगण
बनाम 
विजय कुमार (मृत), विधिक प्रतिनिधियों द्वारा एवं अन्य

निर्णय 

कोई लीलाधर, वर्तमान मूल अपीलार्थी दिनांक 15.2.1985 को वर्तमान वादीगण-प्रत्युत्तरदातागण के पिता देशराज के साथ ₹ 40 हजार की धनराशि में भूमि के 18 बीघा को विक्रय करने का करार किया था। स्वीकृत रूप में ₹ 35 हजार की धनराशि अग्रिम संदत की गयी थी। विक्रय के करार को दिनांक 18.2.1985 को रजिस्ट्रीकृत किया गया था। पक्षकारों के बोच दिनांक 26.3.1985 को एक अन्य दस्तावेज (प्रदर्श पी-14) निष्पादित किया गया था। लीलाधर को अतिशेष ₹ 5 हजार संदत्त किया गया था और पश्चात्वर्ती करार यह उल्लेख करता है कि देशराज को भूमि का कब्जा प्रदान किया गया था। दिनांक 20.1.1988 को देशराज ने लीलाधर को उसे विक्रय-विलेख को निष्पादित कराने के लिये कहते हुये विधिक सूचना जारी की गयी थी। 

वादीगण के अनुसार वे और उनके पिता उस प्रयोजन के लिये दिनांक 15.10.1988 के उपरजिस्ट्रार के कार्यालय में गये थे, किन्तु लीलाधर नहीं आया था। दिनांक 16.5.1988 को लीलाधर की मृत्यु हो गयी और इसके पश्चात् वर्तमान प्रत्युत्तरदातागण संविदा के विनिर्दिष्ट अनुपालन की प्रार्थना करते हुये, सिविल न्यायाधीश, नैनीताल के न्यायालय में वाद दाखिल किये और यह भी प्रार्थना किये कि यदि वादग्रस्त भूमि का कोई भाग उनके कब्जे में नहीं पाया जाता है, तब उसका कब्जा उन्हें दिलाया जाये। अनुकल्प में उन्होंने ब्याज सहित ₹ 40 हजार की वापसी की प्रार्थना की।

2. लिखित कथन में लीलाधर ने यह अभिवाक लिया कि प्रश्नगत करार मिथ्या विलेख था। देशराज साहूकार था, किन्तु उसके पास धन को उधार देने की अनुज्ञप्ति नहीं थी। इसलिये, वे अपने को अग्रिम दिये गये ऋण को सुनिश्चित करने के लिये ऐसे विलेखों को निष्पादित कराया करता था यह भी अभिवचन किया गया था कि लीलाधर ने 3.3.1987 को ब्याज सहित सम्पूर्ण धनराशि देशराज को वापस लौटा दिया था। इस वाद को विचारण न्यायालय द्वारा डिक्रीत किया गया था। लीलाधर ने अपील दाखिल की थी जिसे प्रथम अपीलीय न्यायालय द्वारा यह अभिनिर्धारित करते हुये आंशिक रूप में यह अनुज्ञात किया गया था कि वादीगण विनिर्दिष्ट अनुपालन के वैवेकिक अनुतोष के हकदार नहीं थे। 

इस निर्णय को उच्च न्यायालय के समक्ष चुनौती दी गयी थी। द्वितीय अपील को अनुज्ञात किया गया था और मामले को विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम, 1963 की धारा 20 (2) (ग) के प्रावधानों को ध्यान में रखते हुये नये सिरे से विनिश्चित करने के लिये प्रथम अपीलीय न्यायालय के समक्ष प्रतिप्रेषित किया गया था। प्रतिप्रेषण के पश्चात् अपर जिला न्यायाधीश ने लीलाधर की अपील को खारिज कर दिया था और विचारण न्यायालय के आदेश को सम्पृष्ट किया था। उच्च न्यायालय के समक्ष लीलाधर के द्वारा दाखिल की गयी दूसरी अपील खारिज की गयी थी और इसलिये यह अपील दाखिल की गयी।

3. अपीलार्थीगण की ओर से उपसंजात होने वाले विद्वान वरिष्ठ अधिवक्ता श्री विकास सिंह के द्वारा उठाया गया मुख्य आधार यह है कि धारा 20 (2) (ग) के निबन्धनों में विनिर्दिष्ट अनुपालन की डिक्री वर्तमान वादीगण-प्रत्युत्तरदातागण के पक्ष में मंजूर नहीं की जा सकती है। यह तर्क किया गया है कि दस्तावेज एक मिथ्या दस्तावेज था। अग्रेतर यह तर्क किया गया है कि कब्जा वादीगण के साथ नहीं है और यह तथ्य कि देशराज ने विभिन्न दस्तावेजों को निष्पादित किया था. 

किन्तु उन संविदाओं के सम्बन्ध में विनिर्दिष्ट अनुपालन के लिये वाद दाखिल नहीं किया था, यह इंगित करता है कि यह विलेख (प्रदर्श पी-13) को केवल ऋण के प्रतिसंदाय को सुनिश्चित करने के लिये ही सनिश्चित किया गया था। यह भी प्रार्थना की गयी है कि मामले के विशिष्ट तथ्यों तथा परिस्थितियों में, विवेकाधिकार का प्रयोग अपीलार्थीगण के पक्ष में किया जाना चाहिये। दूसरी तरफ, प्रत्युत्तरदाता की ओर से उपसंजात होने वाले विद्वान अधिवक्ता पी० के० जैन ने यह तर्क किया है कि तथ्य के यह समवर्ती निष्कर्ष प्रदान किये गये हैं कि निष्पादित किया गया विलेख विक्रय का करार था और लीलाधर ने सम्पूर्ण धनराशि को प्राप्त किया था. कब्जे को अन्तरित किया था और इसलिये वह यह तर्क करने का हकदार नहीं है कि विनिर्दिष्ट अनुपालन की डिक्री प्रदान नहीं की जानी चाहिये थी।

4. हम कुछ महत्वपूर्ण तथ्यों का उल्लेख कर सकते हैं। विक्रय का करार (प्रदर्श पी-13) को दिनांक 18.2.1985 को रजिस्ट्रीकृत किया गया है, ₹40,000 में से ₹ 35,000 संदत किया गया है। ₹ 5,000 का अतिशेष उस समय संदत्त किया गया था, जब दिनांक 26.3.1985 को विलेख (प्रदर्श पी-14) को निष्पादित किया गया था। 

जहां तक विलम्ब का सम्बन्ध है हमारा यह विचारित विचार है कि वाद दाखिल करने में कोई विलम्ब नहीं हुआ है। वाद परिसीमा के भीतर है। पुन: इस वाद में अपीलार्थीगण के अनुसार भी भूमि का कब्जा वादीगण-प्रत्युत्तरदातागण के पास था। इसलिये विक्रय-विलेख को निष्पादित कराने की कोई अतिशीघ्रता नहीं थी और यह उन्हें विनिर्दिष्ट अनुपालन का अनतोष प्राप्त करने के लिये हकदार नहीं बनाता है।

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5. जहां तक देशराज के साहकार होने और केवल धनराशि के प्रतिसंदाय को सुनिश्चित करने के लिये इस विलेख को निष्पादित कराने का सम्बन्ध है, सभी अवर न्यायालय तथ्य के रूप में यह पाये हैं कि यह मामला नहीं है। निष्कर्ष यह है कि विक्रय का करार निष्पादित किया गया था। श्री सिंह ने प्रथम चक्र में प्रथम अपीलीय न्यायालय द्वारा पारित किये गये आदेश को निर्दिष्ट किया है। 

उस आदेश को उच्च न्यायालय के द्वारा अपास्त किये जाने के कारण वह अपीलार्थीगण की सहायता नहीं कर सकता है। प्रतिप्रेषण के पश्चात् प्रथम अपीलीय न्यायालय ने स्पष्ट रूप में यह अभिनिर्धारित किया था कि लीलाधर द्वारा विश्वास व्यक्त किये गये प्रश्नगत विलेखों का उसके द्वारा प्रयोग नहीं किया जा सकता था, क्योंकि वे केवल प्रतिलिपियाँ थीं और यदि वास्तविक रूप में उन ऋणों को प्रतिसंदत किया होता, तब उसने देशराज से मूल वापस प्राप्त किया होता। यद्यपि हमारे समक्ष विभिन्न निर्णय उद्धृत किये गये हैं, हम उसे निर्दिष्ट करना महसूस नहीं करते, जब हम एक बार इस निष्कर्ष पर आते हैं कि करार विक्रय करार था और विक्रय का करार करने के पश्चात् लीलाधर ने सम्पूर्ण विक्रय प्रतिफल प्राप्त किया था और कब्जा देशराज को सौंपा था, तब अपीलार्थी के पक्ष में कोई विवेकाधिकार का प्रयोग करने का प्रश्न भी उद्भभूत नहीं होता है। 

6. विनिर्दिष्ट अनुतोष की धारा 20 (2) (ग) निम्न प्रकार से पठित है :

       "20. विनिर्दिष्ट अनपालन को डिक्रीत करने के बारे में विवेकाधिकार-(1) विनिर्दिष्ट अनुपालन को डिक्रीत करने की अधिकारिता वैवेकिक होती है और न्यायालय ऐसा अनुतोष मात्र इस कारण से प्रदान करने के लिये आबद्ध नहीं होता है कि ऐसा करना विधिपूर्ण है; किन्तु न्यायालय का विवेकाधिकार मनमाना नहीं होता है. अपित वह स्वस्थ और युक्तियुक्त न्यायिक सिद्धान्तों के द्वारा मार्गदर्शित और न्यायालय के द्वारा सुधार के योग्य होता है।

(2) निम्नलिखित ऐसे मामले हैं, जिसमें न्यायालय विनिर्दिष्ट अनुपालन को डिक्रीत न करने के लिये उचित रूप में विवेकाधिकार का प्रयोग कर सकता है:

(क)?
(ख)?
(ग)  यहां पर प्रतिवादी ने ऐसी परिस्थितियों के अधीन संविदा की थी, जो यद्यपि संविदा को शून्यकरणीय नहीं बनाती है, किन्तु उसे विनिर्दिष्ट अनुपालन को प्रवर्तित करने के लिये असामयिक बनाती है।

स्पष्टीकरण 1.- प्रतिफल की मात्र अपर्याप्तता अथवा मात्र यह तथ्य कि संविदा प्रतिवादी के लिये दुर्लभ है अथवा असंभाव्य प्रकति की है, को खण्ड (क) अर्थ के भीतर अनुचित लाभ अथवा खण्ड। (ख) अर्थ के भीतर कठिनाई गठित करने के लिये नहीं समझी जायेगी।

स्पष्टीकरण 2.-यह प्रश्न क्या संविदा के अनुपालन में खण्ड (ख) के अर्थ के भीतर ऐसे मामलों के सिवाय कठिनाई अन्तर्ग्रस्त होगी, जहां पर कठिनाई संविदा के पश्चात् वादी के किसी कृत्य से परिणामित हुई थी, को संविदा के समय विद्यमान परिस्थितियों के सम्बन्ध में अवधारित किया जायेगा।

7. विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम की धारा 20 की उपधारा (2) के खण्ड (ग) का लाभ लेने के लिये विनिर्दिष्ट अनुपालन के लिये वाद में प्रतिवादी को यह दर्शाया जाना चाहिये कि उसने संविदा को ऐसी परिस्थितियों के अधीन किया था जो संविदा को शून्यकरणीय बनाती है, फिर भी वह उसे असामयिक बनाती है। वर्तमान मामले में, जब हम एक बार यह अभिनिर्धारित किये हैं कि विलेख विक्रय का करार है, न कि मिथ्या संव्यवहार है, तब अपीलार्थीगण इस प्रावधान का लाभ नहीं ले सकते हैं।

8. उक्त की दृष्टि में हम अपील में कोई बल नहीं पाते हैं, जिसे तद्नुसार खारिज किया जाता है। लंबित आवेदन, यदि कोई हो, निस्तारित हो जाता (ते) हैं।

नोट : [ ज्ञानी लॉ द्वारा उक्त आदेशो का हिंदी रूपांतरण सिर्फ जन-सामान्य व् अधिवक्ता गणों को हिंदी में उक्त आदेशों को समझने हेतु प्रस्तुत किये जातें है इनका प्रयोग किसी भी विधिक कार्यवाही में करना त्रुटिपूर्ण होगा ]

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