मध्य प्रदेश राज्य बनाम मूर्ति श्री चतुर्भुजनाथ

मध्य प्रदेश राज्य बनाम मूर्ति श्री चतुर्भुजनाथ

(उच्चतम न्यायालय)
सिविल अपील संख्या 956 वर्ष 2010 
25 अक्टूबर, 2019 को विनिश्चित
मध्य प्रदेश राज्य एवं अन्य
बनाम
मूर्ति श्री चतुर्भुजनाथ एवं अन्य

निर्णय

नविन सिन्हा, न्यायमूर्ति - प्रतिवादीगण उनकी द्वितीय अपील के खारिज होने के परिणामस्वरूप अपील में है। प्रत्युत्तरदाता ने घोषणा और स्थायी व्यादेश के लिये एक वाद दाखिल किया था जो खारिज कर दिया था खारिज किये जाने को प्रथम अपील में उलट दिया गया था और वाद डिक्रीत किया गया था।

2. अपीलार्थीगण के विद्वान अधिवक्ता श्री राहुल कौशिक ने निवेदन किया था कि प्रत्युत्तरदाता संख्या 1 एवं  सार्वजनिक मन्दिर था। इसलिये कलेक्टर का नाम 'व्यवस्थापक' (प्रबन्धक) के रूप में अभिलिखित करने के द्वारा राजस्व अभिलेखों को सही तौर पर संशोधित किया गया था जो मन्दिर सम्पत्तियों की बेहतर व्यवस्था के लिये किया गया था। प्रत्युत्तरदाता संख्या 2 एवं 3 केवल पुजारी थे। इसलिये, उन्हें मन्दिर की भूमि के स्वामित्व का दावा करने का न्यूनाधिक हस्तक्षेप के विरुद्ध अवरोध इप्सित करते हुये उनका नाम राजस्व अभिलेख में प्रविष्ट कराने का कोई अधिकार नहीं था। मन्दिर औकफ विभाग से सम्बन्धित सरकारी भूमि पर स्थित होने के कारण "देवस्थानी माफी" था। पुजारियों के पास भूमि में 'भूमि स्वामी अधिकार' नहीं थे। सिविल अपील संख्या 5041 वर्ष 2009 रमेश दास (मत) द्वारा विधिक प्रतिनिधिगण बनाम मध्य प्रदेश राज्य एवं अन्य, में एक आदेश दिनांक 22.7.2019 पर और श्री राम मन्दिर इन्दौर बनाम मध्य प्रदेश राज्य एवं अन्य, 2019 (4) स्केल 302 : 2019 (2) एस सी सी डी 1078 (एस सी), पर विश्वास व्यक्त किया गया था।

3. इसके विपरीत, प्रत्युत्तरदातागण के विद्वान अधिवक्ता श्री रंधीर सिंह जैन ने निवेदन किया था कि पुजारियों ने कभी भी भूमियों के लिये उनमें किसी स्वामित्वाधिकार का दावा नहीं किया था। देवा भूमिस्वामी हाकिम के प्रबन्धक सैयद मोहम्मद अली द्वारा दान दी गयी देवता में से सम्बन्धित भूमियां थी देवता बहुत लम्बे समय से भमियों के शांतिपूर्ण कब्जे और अधिभोग में थे। मन्दिर की आय के आधार पर पुजारियों द्वारा पूजा की जा रही थी। भूमि राजस्व प्रविष्टियों में बहुत बाद में 1979-80 में कलेक्टर को प्रबन्धक के रूप में अभिलिखित करने के द्वारा किया गया संशोधन, मध्य प्रदेश भू-राजस्व संहिता, 1959 (एतस्मिन्पश्चात् 'संहिता' के रूप में निर्दिष्ट) की धारा 115 में विहित प्रक्रिया के पूर्णतः उल्लंघन में था जैसे कि प्रथम अपीलीय न्यायालय और उच्च न्यायालय द्वारा समवर्ती निर्णीत किया गया था। सिविल अपील संख्या 8554 वर्ष 2015, मध्य प्रदेश राज्य सरकार एवं अन्य बनाम नरसिंह मन्दिर, चिखाल्दा एवं अन्य, में एक आदेश दिनांक 6.10.2016 पर विश्वास व्यक्त किया गया था।

4. हमने पक्षकारों की ओर से किये गये निवेदनों पर विचार किया है और पक्षकारों के अधिवक्ता द्वारा विश्वास व्यक्त की गयी सामग्रियों और उदधृत पूर्व निर्णयों का भी परिशीलन किया है।

State of M.P Versus Murti Shri chaturbhujnath

5. वाद देवता द्वारा पुजारियों के माध्यम से भूमि स्वामी हाकिम के प्रबन्धक सैयद मोहम्मद अली से प्राप्त भूमियों, स्थित खोंद कलां, जिला उज्जैन, के स्वामित्व का दावा करते हुये दाखिल किया गया था। पुजारियों ने उनमें भूमियों के स्वामित्वाधिकार का कोई दावा नहीं किया था। मन्दिर पुजारियों के पूर्वजों द्वारा निर्मित करवाया गया था जो निरन्तर पूजा करते रहे और भूमियों का उपभोग भी करते रहे थे। उन्हें अचानक वर्ष 1979-80 में भूमि अभिलेखों के स्तम्भ 3 में किये गये संशोधन से अवगत कराया गया था जब कलेक्टर ने वाद संस्थित किये जाने को अग्रसर करते हुये भूमियों की व्यवस्था नीलामी के लिये नोटिस प्रकाशित को थी। मन्दिर के कथित किसी कुप्रबन्ध के सम्बन्ध में अभिलेख पर कोई सामग्री नहीं है, जो कलेक्टर द्वारा उसे ग्रहण किया जाना अपेक्षित करता था। अभिलेख पर साक्ष्यों के आधार पर प्रत्युत्तरदातागण वादीगण को भूमि के मोरूसी कृषक निर्णीत किया गया है। स्तम्भ 3 उनका अधिभोग अभिलिखित करता है, जबकि स्वामित्व देवता के नाम में है।

6. अपीलार्थी का यह वाद नहीं है कि वादी मन्दिर जिला उज्जैन के लिये 2013 में तैयार की गयी सार्वजनिक मन्दिरों की सूची में अभिलिखित है जैसा श्री राम मन्दिर इन्दौर (उक्त) में उल्लेख किया गया था। भूमियां सरकार से देवता द्वारा पट्टे पर नहीं ली गयी है किन्तु पहले के स्वामी से। रमेश दास (उक्त) अपने ही तथ्यों पर सुभिन्न योग्य है क्योंकि प्राइवेट मन्दिर के दावे के लिये भूमियों का स्वामित्व देवता के नाम पर नहीं किया जा रहा था किन्तु उनके नाम जो भौतिक रूप से भूमियों पर काबिज थे।

7. वर्तमान वाद में देवता का नाम वर्ष 1969-70, 1970-71 एवं 1972-73 के लिये राजस्व प्रविष्टियों में अभिलिखित है। वही स्थिति 1973 से 1977 के लिये राजस्व प्रविष्टियों के सम्बन्ध में भी है। अपीलार्थीगण का यह वाद नहीं है कि 1979-80 में राजस्व प्रविष्टियों में संशोधन संहिता की धारा 115 के उपबन्धों के अनुसरण में किया गया था। धारा निम्न प्रकार से पठित है:

       "115. भूमि अभिलेख में गलत या असत्य प्रविष्टि का संशोधन.-(1) एक उपखण्ड अधिकारी, स्वप्रेरणा से या किसी व्यथित व्यक्ति के आवेदन पर, ऐसी जांच करने के पश्चात, जैसे वह उचित समझे धारा 114 के अधीन तैयार किये गये भूमि अभिलेख में अनधिकृत प्रवष्टि सहित, भूमि अधिकार पुस्तिका और अधिकार अभिलेख से भिन्न कोई गलत या असत्य प्रविष्टि को सही कर सकता है और ऐसे संशोधन उसके द्वारा प्रमाणित किये जायेंगे।"

परन्तु यह कि पांच वर्ष से पूर्व की अवधि से सम्बन्धित किसी प्रविष्टि में संशोधन के लिये कलेक्टर की लिखित मंजूरी के बिना कोई कार्यवाही संस्थित नहीं की जायेगी। (2) उपधारा (1) के अधीन :

(क) सम्बन्धित तहसीलदार से लिखित रिपोर्ट प्राप्त किये, और ।

(ख) सभी हितबद्ध पक्षकारों को सुनवाई का अवसर दिये बिना कोई आदेश पारित नहीं किया जायेगा:

परन्तु यह कि जहां सरकार का हित अन्तर्ग्रस्त है, उपखण्ड अधिकारी वाद को कलेक्टर को निवेदित करेगा। (3) उपधारा (2) के अधीन वाद प्राप्त होने पर कलेक्टर ऐसी जांच करेगा और ऐसा आदेश करेगा जैसे वह उचित समझे।"

8. प्रथम अपीलीय न्यायालय और उच्च न्यायालय द्वारा यह समवर्ती निष्कर्ष है कि क्योंकि प्रक्रिया का अनुसरण नहीं किया गया था, राजस्व अभिलेखों में किया गया संशोधन और जिसके आधार पर मन्दिर को एक सार्वजनिक मन्दिर होने का और उसके प्रबन्धक के रूप में कलेक्टर के होने का दावा किया गया था असंधार्य था। मध्य प्रदेश राज्य सरकार बनाम नरसिंह मन्दिर, चिखाल्दा (उक्त) में इस न्यायालय ने संप्रेक्षित
किया था:

      "चाहे जो कुछ भी हो, प्रत्युत्तरदातागण की अपील, विधि के सारवान् प्रश्न संख्या 2 पर ही सफल होने के लिये अधिकृत थी, क्योंकि इस सम्बन्ध में उपयुक्त जांच और प्रभावी पक्षकार नामत: वर्तमान प्रत्युत्तरदातागण को अवसर दिये बिना तहसीलदार द्वारा राजस्व अभिलेख में प्रविष्टि परिवर्तित नहीं की जा सकती थी। इसलिये उच्च न्यायालय का निर्णय केवल उसी आधार पर संधार्य किया जा सकता है। उल्लिखित करना निरर्थक है कि सम्बन्धित प्राधिकारी अग्रेतर कार्यवाही करने के लिये यदि कोई है, म० प्र० भू-राजस्व संहिता, 1959 की धारा 115 के अधीन प्रक्रिया का पालन करने के लिये सदैव स्वतन्त्र हैं।

अपील उपर्युक्त संप्रेक्षणों के साथ खारिज की जाती है।"

9. इसलिये हम वर्तमान अपील में कोई सार नहीं पाते हैं। इसलिये अपील खारिज की जाती है, किन्तु उपर्युक्त के समान संप्रेक्षणों के साथ।

नोट : [ ज्ञानी लॉ द्वारा उक्त आदेशो का हिंदी रूपांतरण सिर्फ जन-सामान्य व् अधिवक्ता गणों को हिंदी में उक्त आदेशों को समझने हेतु प्रस्तुत किये जातें है इनका प्रयोग किसी भी विधिक कार्यवाही में करना त्रुटिपूर्ण होगा ]

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