उ० प्र० राज्य एवं अन्य बनाम अली हुसैन अन्सारी एवं एक अन्य

उ० प्र० राज्य एवं अन्य बनाम अली हुसैन अन्सारी

(उच्चतम न्यायालय) 
सिविल अपील संख्या 314 वर्ष 2020 
15 जनवरी, 2020 को विनिश्चित 

उ० प्र० राज्य एवं अन्य
बनाम
अली हुसैन अन्सारी एवं एक अन्य

निर्णय

संजीव खन्ना, न्यायमूर्ति.- अनुमति प्रदान की गयी।

2. उत्तर प्रदेश राज्य तथा उसके कृत्यकारियों ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के द्वारा पारित किये गये दिनांक 19.7.2018 के निर्णय को चुनौती देते हुये वर्तमान अपील को दाखिल की हैं, जिसके द्वारा खण्डपीठ ने उनकी अपील को खारिज कर दिया है

तथा सेवानिवृत्ति लाभों के रूप में सेवा में निरन्तरता तथा पदोन्नति, यदि कोई हो, के साथ, परन्तु 8.6.1987 से 30.6.2006 तक की अवधि के लिये वेतन के वास्तविक संदाय के बिना पारिणामिक लाभों की मंजूरी को निर्देशित करते हुये विद्वान एकल न्यायाधीश के द्वारा पारित किये गये दिनांक 4.1.2018 के आदेश को अभिपुष्ट किया है।

खण्डपीठ ने आक्षेपित आदेश के माध्यम से तद्द्वारा प्रथम प्रत्युत्तरदाता की नियुक्ति की प्रारम्भिक तारीख को 8.6.1987 के रूप में मानते हुये सेवा की निरन्तरता से सम्बन्धित निष्कर्ष को अभिपुष्ट किया है और यह निर्देशित किया है कि 8.6.1987 से 30.6.2006 को वास्तविक पदभार ग्रहण करने की तारीख तक के बीच की अवधि को पेंशनीय लाभों सहित पारिणामिक लाभों के प्रयोजन के लिये संगणित किया जायेगा, हालांकि उसे पिछली मजदूरी के संदाय के लिये अपवर्जित किया जायेगा।\

3. पक्षकारों के विद्वान अधिवक्तागण को सुनने के पश्चात् विलक्षण तथ्यों की दृष्टि में तथा साम्या के सन्तुलन पर हम यह महसूस करते हैं कि सेवानिवृत्ति के पश्चात्वर्ती लाभों, आदि, जैसे कि प्रदान किया गया है, से सम्बन्धित निर्देशों में उपान्तरण आवश्यक है।

4. अली हसैन अन्सारी, हमारे समक्ष प्रथम प्रत्युत्तरदाता की तदर्थ आधार पर सत्य प्रकाश विवेकानन्द इण्टर कालेज, मुसाहारी देवरिया, उत्तर प्रदेश में सहायक अध्यापक के रूप में नियुक्ति के लिये सिफारिश की गयी थी। तथापि, उक्त कालेज की प्रबन्ध समिति, हमारे समक्ष द्वितीय प्रत्युत्तरदाता सहमत नहीं हुई थी और परिणामस्वरूप नियुक्ति पत्र जारी नहीं किया था। उन्होंने पद पर प्रत्यक्ष भर्ती के लिये दिनांक 8.7.1987 को विज्ञापन जारी किया था। रोजगार कार्यालय में रजिस्ट्रीकृत नामों को शामिल किया जाना था। 

किसी शेष मणि शुक्ला को चयन पर नियुक्त किया गया था और अनुमोदन के लिये जिला विद्यालय निरीक्षक, देवरिया को दिनांक 11.9.1987 का पत्र लिखा गया था। तथापि, जिला विद्यालय निरीक्षक, देवरिया ने इनकार कर दिया था तथा दिनांक 10.12.1987 के अपने पत्र के माध्यम से अन्य बातों के साथ ही साथ यह कथन करते हुये अनुमोदन प्रदान नहीं किया था कि शेष मणि शुक्ला का चयन उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा सेवा चयन आयोग (कठिनाई निवारण) आदेश, 1981 के प्रावधानों के प्रतिकल था। जिला विद्यालय निरीक्षक, देवरिया ने। दिनांक 20.4.1988 के आदेश के द्वारा शेष मणि शक्ला की नियक्ति के लिये वित्तीय अनुमोदन प्रदान करने से। 

इंकार कर दिया था। जिला विद्यालय निरीक्षक, देवरिया के द्वारा अपनाये गये आधार से व्यथित होकर शेष। मणि शुक्ला ने इन आदेशों को इलाहाबाद उच्च न्यायालय के समक्ष रिट याचिका संख्या 14530/1988 में। चनौती दी थी। दिनांक 27.1.1992 के अन्तरिम आदेश के द्वारा जिला विद्यालय निरीक्षक, देवरिया तथा दूसरे प्रत्युत्तरदाता सहित हमारे समक्ष अपीलार्थीगण को शेष मणि शुक्ला का वेतन संदत्त करने के लिये निर्देशित किया गया था। 

इसलिये और अन्तरिम आदेश के निबन्धनों में, शेष मणि शुक्ला ने 23.4.2004 जब उच्च न्यायालय ने उसके द्वारा दाखिल की गयी रिट याचिका को खारिज कर दिया था, तक कार्य किया था और उसे वेतन संदत्त किया गया था। व्यथित होकर शेष मणि शुक्ला ने विशेष अपील संख्या 590, वर्ष 2004 प्रस्तुत किया था, जिसे उच्च न्यायालय की खण्डपीठ के द्वारा 22,2.2006 को खारिज कर दिया गया था। इस निर्णय के विरुद्ध अपील को भी इस न्यायालय के द्वारा सिविल अपील संख्या 4966, वर्ष 2009 में दिनांक 31.7.2009 के निर्णय के माध्यम से खारिज कर दिया गया था।

5. उसके उपरान्त प्रथम प्रत्युत्तरदाता को नियक्ति पत्र जारी किया गया तथा उसे सक्षम प्राधिकारी, अर्थात् जिला विद्यालय निरीक्षक, देवरिया के द्वारा दिनांक 31.7.2006 का आदेश जारी करने के पश्चात् 30.6.2006 को सहायक प्रोफेसर के रूप में नियुक्त किया गया था। प्रथम प्रत्युत्तरदाता अधिवर्षिता की आयु प्राप्त करने के पश्चात् 30.6.2009 को सेवानिवृत्त हुआ था।

6. 1.5.2008 को अथवा उसके लगभग प्रथम प्रत्युत्तरदाता ने 8.6.1987 से 30.6.2006 तक के वेतन के बकाये के संदाय की ईप्सा करते हुये उच्च न्यायालय के समक्ष रिट याचिका संख्या 221012, वर्ष 2008 दाखिल किया था। रिट याचिका को विद्वान एकल न्यायाधीश के दिनांक 1.5.2008 के आदेश के माध्यम से प्रथम प्रत्युत्तरदाता के द्वारा प्रस्तुत किये गये प्रत्यावेदन पर विचार करने तथा निर्णीत करने के लिये जिला विद्यालय निरीक्षक, देवरिया को निर्देश के साथ निस्तारित कर दिया गया था। 

जिला विद्यालय निरीक्षक, देवरिया ने दिनांक 20.5.2009 के आदेश के माध्यम से वेतन के बकाये के संदाय के लिये प्रत्यावेदन को 'काम नहीं' तो वेतन नही' के सिद्धांत पर नामंजूर कर दिया था। व्यथित होकर प्रथम प्रत्युत्तरदाता ने रिट याचिका संख्या 11131, वर्ष 2010 प्रस्तुत किया था, जिसे दिनांक 4.1.2018 के निर्णय के माध्यम से यह निर्देशित करते हुये निस्तारित कर दिया गया था कि प्रथम प्रत्युत्तरदाता 8.6.1987 से प्रभावी रूप में पेंशन लाभों सहित पारिणामिक लाभों का हकदार होगा।

हमने विशेष अपील त्रुटिपूर्ण संख्या 416, वर्ष 2018 में खण्डपीठ के द्वारा पारित किये गये आदेश को पहले ही निर्दिष्ट किया हैं, जिसने अपील को अन्य बातों के साथ ही साथ यह अभिनिर्धारित करते हुये खारिज कर दिया है कि प्रत्युत्तरदाता सेवानिवृत्ति लाभों के संदाय के प्रयोजन के लिये वरिष्ठता और पदोन्नति का लाभ, यदि कोई हो, के साथ 8.6.1987 से प्रभावी रूप में सेवा में माने जाते हुये सेवानिवृत्ति लाभों का हकदार होगा। तथापि, वास्तविक वेतन को 'काम नहीं, तो वेतन नहीं' के सिद्धांत पर संदत्त नहीं किया जाना था।

7. ऊपर अभिलिखित तथ्यों से यह प्रकट है कि शेष मणि शुक्ला ने चयन तथा नियुक्ति पर वर्ष 1988 में रिट याचिका दाखिल की थी और वर्ष 2004 तक सहायक प्रोफेसर के रूप में कार्य किया था। यह उच्च न्यायालय के द्वारा जारी किये गये अन्तरिम आदेश की दृष्टि में था। शेष मणि शुक्ला को भी सहायक प्रोफेसर के रूप में वेतन संदत्त किया गया था। 

प्रथम प्रत्युत्तरदाता की यद्यपि सहायक अध्यापक के रिक्त पद के लिये सिफारिश की गयी थी, फिर भी उसे नियुक्ति पत्र कभी जारी नहीं किया गया था और उसे नियुक्त नहीं किया गया था तथा उसने 30.6.2006 को पदभार ग्रहण करने तक कार्य नहीं किया था। तीन वर्षो तक कार्य करने के पश्चात् वह 30.6.2009 को सेवानिवृत्त हुआ था। उपरोक्त विलक्षण तथ्यात्मक स्थिति को ध्यान में रखते हुये हम सेवानिवृत्ति लाभों के संदाय पर न्यायालय के द्वारा दिये गये निर्देश को इस निर्देश के साथ उपान्तरित करते हैं कि प्रथम प्रत्युत्तरदाता को मुआवजे के रूप में ₹ 4,00,000 (चार लाख रुपये मात्र) की धनराशि संदत्त की जायेगी। 

यह मुआवजा ऐसे किसी अन्य लाभ के अलावा होगा, जो प्रथम प्रत्युत्तरदाता को उसकी नियुक्ति की तारीख को 30.6.2006 के रूप में मानते हुये विधि के अनुसार संदेय होगा।₹ 4,00,000 (चार लाख रुपये मात्र) की उपरोक्त धनराशि अपीलार्थी के द्वारा इस आदेश की तारीख से छ: सप्ताह की अवधि के भीतर संदत्त । की जायेगी और संदाय में विलम्ब की स्थिति में, अपीलार्थी इस आदेश की तारीख से 10% वार्षिक की दर । पर ब्याज संदत्त करने के लिये दायी होगा। अपील को तद्नुसार निस्तारित किया जाता है।

नोट : [ ज्ञानी लॉ द्वारा उक्त आदेशो का हिंदी रूपांतरण सिर्फ जन-सामान्य व् अधिवक्ता गणों को हिंदी में उक्त आदेशों को समझने हेतु प्रस्तुत किये जातें है इनका प्रयोग किसी भी विधिक कार्यवाही में करना त्रुटिपूर्ण होगा ]

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