घाट तालाब कौलान बनाम बाबा गोपाल दास

घाट तालाब कौलान बनाम बाबा गोपाल दास

(उच्चतम न्यायालय)
सिविल अपील संख्या 724 वर्ष 2020 
31 जनवरी, 2020 को विनिश्चित 

घाट तालाब कौलान वाला

बनाम

बाबा गोपाल दास चेला सुरती दास (मृत), द्वारा विधिक प्रतिनिधि राम निवास

निर्णय 

हेमन्त गुप्ता, न्यायमूर्ति.- वादी 18 जुलाई, 2016 को पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के द्वारा पारित किये गये आदेश के द्वारा व्यथित होकर इस अपील में है, जिसके द्वारा उसके पक्ष में दोनों अवर न्यायालयो की डिक्री को इस कारण से अपास्त कर दिया गया था कि चरन दास (अ० सा० 1) वाद दाखिल करने के लिये सक्षम नहीं था, 

क्योंकि यह खैरात की प्रकृति, जिसका न्यास ने वचन दिया था, को प्रदर्शित नहीं कर सका था और यह कि ऐसा वाद सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 की धारा 92 की अपेक्षाओं का अनुपालन किये बिना पोषणीय नहीं है। न्यायालय ने निम्न प्रकार से अभिनिर्धारित किया था :

       "20. सार्वजनिक न्यास के विरुद्ध वाद को पोषित करने के लिये सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 92 के अधीन न्यायालय की अनुमति आज्ञापक है। वादी के अभिवचन सहजदृश्य रूप में इन तथ्यों के बारे में मौन हैं। द्वितीयतः वाद को पोषित करने के लिये वादी को यह दर्शाना होगा कि सम्पत्ति का जनसामान्य के पक्ष में पूर्ण समर्पण था। 

संदेह से बिलकुल परे यह साबित करने के लिये साक्ष्य होना चाहिये कि न्यास एक सार्वजनिक न्यास है। यद्यपि धार्मिक अथवा पूर्त प्रयोजनों के लिये सम्पत्ति को समर्पित करने के लिये लिखित में कोई अनदेश आवश्यक नहीं है। 

केवल न्यास को सृजित करने तथा न्यासी के रूप में आदाता में उसके निहित होने के आशय का स्पष्ट असंदिग्ध अभिव्यक्तकरण आवश्यक है। न्यास तथा उसके न्यासी को सृजित करने के आशय का ऐसा कोई अभिव्यक्तकरण अभिलेख पर नहीं आया है।"

2. अपीलार्थी ने बाबा गोपाल दास (अब मृत) को मन्दिर का प्रबन्ध, भवन तथा अन्य सम्पत्ति को रिक्त करने के लिये निर्देशित करते हुये, आज्ञापक व्यादेश के लिये वाद दाखिल किया था। अपीलार्थी ने स्वयं को प्रबन्धक तथा न्यासी के द्वारा प्रबन्धित की जाने वाली वादग्रस्त सम्पत्ति का स्वामी अभिकथित किया है। 

प्रतिवादी को सेवादार होने के लिये कहा गया था। उक्त वाद में, प्रतिवादी का आधार यह था कि वादी के प्रतिनिधिगण मनोहर लाल तथा चरन दास को अपीलाथी के प्रबन्धकगण अथवा न्यासीगण के रूप में कभी भी नहीं नियक्त किया गया था और उन्होंने राजस्व अभिलेख में अपने नामों को कपटपर्वक प्रविश करा लिया था। 

प्रतिवादी का आधार यह था कि उसने मन्दिर के कल्याण के लिये सब कुछ किया था तथा वादी से कभी भी निर्देश की ईप्सा नहीं की थी और उन्हें प्रतिवादी से लेखा-जोखा प्रदान करने की मांग करने का कोई अधिकार नहीं है। पक्षकारों के अभिवचनों पर विद्वान विचारण न्यायालय ने निम्नलिखित विवाद्यकों को विरचित किया था:

supreme court judgement in hindi

  1. क्या वादी प्रार्थित व्यादेश का हकदार है? ओ० पी० पी०
  2. क्या वादी वादग्रस्त सम्पत्ति का स्वामी है, जैसे कि वादपत्र के पैरा संख्या 1 में अभिकथन किया गया है? ओ० पी० पी०
  3. क्या वादी को वाद दाखिल करने हेतु सुनवाई का कोई अधिकार नहीं है? ओ० पी० पी० 
  4. क्या वादी को यह वाद दाखिल करने हेतु कोई वाद हेतुक उद्भूत नहीं हुआ है? ओ० पी० पी०
  5. अनुतोष।"

3. विवाद्यक संख्या 1 और 2 पर, विद्वान विचारण न्यायालय ने यह अभिनिर्धारित किया था कि प्रतिवादी वादी न्यास का सेवादार है और यह कि वादी प्रतिवादी को रखना नहीं चाहता है, क्योंकि वह मन्दिर के हित में उचित रूप की देखभाल नहीं कर रहा है और यह कि उसने मन्दिर की आय का लेखाजोखा प्रदान नहीं किया है। 

न्यायालय ने यह भी पाया था कि प्रतिवादी प्रश्नगत सम्पत्ति के स्वामित्व का दावा नहीं कर रहा है। विचारण न्यायालय ने प्रश्नगत सम्पत्ति पर दुकानों के रूप में कोई निर्माण करने से प्रतिवादी को अवरुद्ध करते हुये वादी के द्वारा 8 अप्रैल, 1986 को दाखिल किये गये शाश्वत् व्यादेश के लिये पूर्ववर्ती वाद में प्रतिवादी के द्वारा किये गये कथन पर विचार किया था। 

अपीलार्थी ने पूर्ववर्ती वाद में प्रतिवादी के अधिवक्ता हरभान सिंह (अ० सा० 3) की परीक्षा की थी, यह कि प्रतिवादी ने यह स्वीकार किया था कि वादग्रस्त सम्पत्ति वादी से सम्बन्धित है तथा प्रतिवादी केवल सेवादार के रूप में कार्य कर रहा है। कथन (प्रदर्श पी-1) निम्न प्रकार से पठित है:

        "मुझे प्रतिवादी से यह अनुदेश प्राप्त हुआ है कि वादग्रस्त सम्पत्ति न्यास, अर्थात् वादी से सम्बन्धित है, जहाँ मैं केवल एक सेवादार के रूप में कार्य कर रहा हूँ। जो कुछ भी मैं करूंगा, वह मैं न्यास के कल्याण के लिये करूंगा और न्यास के प्रबन्धक के द्वारा, 

विशेष रूप में दुकानों के निर्माण के सम्बन्ध में दिये गये किसी भी अनदेश का उसी रीति से, जिसमें दुकानों का निर्माण किया जाना है तथा उसका किराया एकत्र किया जाना है, से सम्बन्धित अनुदेशों का अतिरिक्त रूप से अनुपालन करूंगा।

4. ऐसा निष्कर्ष प्रदान करने के पश्चात् विचारण न्यायालय ने मन्दिर को रिक्त करने हेतु प्रतिवादी को आज्ञापक व्यादेश प्रदान करने से इंकार कर दिया था, परन्तु यह अभिनिर्धारित किया कि वादी लेखा-जोखा की मांग करने का हकदार है।

5. विद्वान विचारण न्यायालय के द्वारा पारित किये गये निर्णय के विरुद्ध व्यथित होकर केवल वादी ने प्रथम अपील दाखिल की थी। विद्वान प्रथम अपीलीय न्यायालय ने भगवान दास एवं अन्य बनाम जय राम पास, ए आई आर 1965 पी० एवं एच० 260 के मामले पर यह अभिनिर्धारित करने के लिये विश्वास व्यक्त किया था कि सेवादार वहाँ पर हटाये जाने के लिये दायी है, जहाँ सेवादार विद्रोही हक का प्रकथन करता है। तथा नियमित लेखा-जोखा रखने में विफल होता है।

6. प्रतिवादी ने प्रथम अपीलीय न्यायालय के द्वारा पारित की गयी डिक्री के विरुद्ध व्यथित होकर न्यायालय के समक्ष द्वितीय अपील दाखिल की थी। द्वितीय अपील की लम्बितता के दौरान बाबा गोपाल दास की मृत्यु हो गयी थी तथा किसी राम निवास को बाबा गोपाल दास का चेला होने का दावा करते हुये। 

सम्पदा का प्रतिनिधित्व करने हेतु पक्षकार बनाये जाने के लिये आदेशित किया गया था। ऐसे आदेश को अपीलार्थी के द्वारा इस न्यायालय के समक्ष सिविल अपील संख्या 9638 वर्ष 2003 में चुनौती दी गयी थी, जिसमें यह अभिनिर्धारित किया गया था कि राम निवास को प्रतिवादी का प्रतिनिधित्व करने के लिये पक्षकार बनाया गया था, 

परन्तु वह सम्पदा के हित में उसे उत्तराधिकारी होने के लिये आच्छादित नहीं करेगा और यह कि इस द्वितीय अपील में मृत बाबा गोपाल दास के साथ ही साथ राम निवास की प्रास्थिति पर प्रारम्भिक विवाद्यक के रूप में स्वतन्त्र रूप से विचार किया जाना होगा।

7. द्वितीय अपील में अपील की स्वीकृति के समय विधि का प्रथम सारवान प्रश्न विरचित किया गया था, जबकि विधि के दूसरे सारवान् प्रश्न का इस न्यायालय के द्वारा आदेश पारित किये जाने के पश्चात् विरचित किया गया था। उसे निम्न प्रकार से पुन: प्रस्तुत किया गया है :

  1. क्या वादी चरन दास घाट तालाब कौलान वाला के रूप में ज्ञात न्यास. जो प्रभु वाला के रूप में भी जाना जाता है, का प्रतिनिधित्व कर सकता था, और क्या चरन दास के द्वारा दाखिल किया गया वाद पोषणीय है?
  2. क्या मृत बाबा गोपाल दास के साथ ही साथ राम निवास की प्रास्थिति पर जब उन पर स्वतंत्रतापूर्वक विचार किया जाता है, उन्हें विधिक प्रतिनिधि बनायेगी जब गोपाल दास ने स्वयं को 'सेवादार' होने का उल्लेख किया था और राम निवास को बाबा गोपाल दास के चेला के रूप में अभिकथित किया गया था?"

8. विधि के दूसरे सारवान् प्रश्न के सम्बन्ध में, उच्च न्यायालय ने यह अभिनिर्धारित किया था कि प्रतिवादी केवल एक सेवादार था, जैसे कि पूर्ववर्ती वाद में उसके कथन में स्वीकार किया गया था और यह कि राम निवास को उसके विधिक प्रतिनिधि के रूप में पक्षकार बनाया गया था। वह केवल लोक का ऐसा सदस्य है, जो मृत प्रतिवादी के स्थान पर अपनी सेवायें प्रदान कर सकता था। न्यायालय ने निम्न प्रकार से अभिनिर्धारित किया था:

        "25.........तथापि, सार्वजनिक न्यास के मामले में प्रत्येक व्यक्ति को सेवा करने का अधिकार है। बाबा गोपाल दास भी इस पर ध्यान दिये बिना कि मन्दिर सार्वजनिक न्यास सम्पत्ति अथवा प्राइवेट न्यास सम्पत्ति के रूप में है, मन्दिर में सेवा कर रहा था। 

बाबा गोपाल दास के द्वारा प्रदान की गयी सेवा की तरह दाय प्राप्त करने के लिये कुछ भी नहीं था। बाबा गोपाल दास की सेवाओं का उत्तराधिकार सभी के लिये उपलब्ध था। जहाँ तक सेवा/सेवादारी के दाय का सम्बन्ध है, राम निवास पर कोई विशेष प्रास्थिति प्रदत्त नहीं की जा सकती है।

26. उपरोक्त अधिकथन की दृष्टि में, लोक का कोई भी सदस्य मन्दिर की सेवा कर सकता है। इसलिये माननीय सर्वोच्च न्यायालय के द्वारा पारित किये गये आदेश के प्रथम भाग की दृष्टि में, गुणावगुण, अर्थात वादग्रस्त सम्पत्ति के विरुद्ध बाबा गोपाल दास के अधिकारों पर किसी भी तात्पर्य के बिना राम निवास को प्रथम अपील में केवल प्रतिनिधित्व के प्रयोजन के लिये पक्षकार बनाया गया था।

 जहाँ तक राम निवास के वैयक्तिक अधिकार पर निर्णय के संदर्भ में आदेश के दूसरे भाग का सम्बन्ध है. उससे यह निर्णीत किया जाना होगा कि राम निवास व्यापक रूप में लोक से भिन्न ऐसा कोई व्यक्ति नहीं है, जो बाबा गोपाल दास के स्थान पर अपनी सेवायें प्रदान कर सकता था। 

यह दर्शाने के लिये न तो कोई अभिवचन है. न ही अभिलेख पर कोई साक्ष्य है कि राम निवास को कभी भेक के द्वारा चेला के रूप में नियुक्त किया गया था अथवा बाबा गोपाल दास के स्थान पर उसे नियुक्त करने के लिये किसी सक्षम प्राधिकारी के द्वारा अथवा किसी साधु समाज के द्वारा कोई अन्य धार्मिक संस्कार सम्पन्न किया गया था।"

9. इस प्रकार विधि के दूसरे सारवान प्रश्न, जैसे कि ऊपर उल्लेख किया गया है को निर्णीत किया गया था, यह कि राम निवास को अपील में मृतक का प्रतिनिधित्व करने के लिये पक्षकार बनाया गया था। उच्च न्यायालय ने यह पाया था कि ऐसा कोई साक्ष्य नहीं था,

कि राम निवास को कभी चेला के रूप में अथवा किसी अन्य रीती में नियुक्त किया गया था परन्तु वह लोक के किसी सदस्य के रूप में मन्दिर को अपनी सेवायें। प्रदान कर रहा था।

10. विधि के प्रथम सारवान प्रश्न को निर्णीत करते समय वाद को पोषणीय न होना पाया गया था। अपीलार्थी के विद्वान अधिवक्ता ने दढतापूर्वक यह तर्क किया था कि उच्च न्यायालय ने अपने निष्कर्ष में विधि की त्रुटि कारित की थी कि संहिता की धारा 92 की दृष्टि म वाद पोषणीय नहीं है,

क्योंकि ऐसा प्रावधान न्यास के विरुद्ध अधिकारिता के आश्रय के लिये तात्पर्यित है। संहिता की धारा 92 की न्यास के द्वारा संस्थित किये गये वाद के सम्बन्ध में कोई प्रयोज्यनीयता नहीं है। यह इंगित किया गया है कि अपीलार्थी ने प्राइवेट मन्दिर के रूप में प्रबन्धक तथा न्यासी के माध्यम से वाद दाखिल किया था। 

तथापि, कार्यवाही की लम्बितता के दौरान न्यास को 29 जून, 2016 को सोसाइटी के रूप में रजिस्ट्रीकृत किया गया था, जब घाट तालाब कौलान वाला प्रभु लाल वाला, गांव मुण्डी खरार, तहसील खरार, जिला एस० ए० एस० नगर के संगम ज्ञाप को रजिस्ट्रीकृत किया गया था।

11. प्रत्युत्तरदाता के विद्वान अधिवक्ता ने यह तर्क किया था कि अपील किसी देविन्दर गुप्ता के द्वारा दाखिल की गयी है, जिसका अपीलार्थी के साथ कोई सम्बन्ध नहीं है, इसलिये अपील स्वयं ही अक्षम व्यक्ति के द्वारा दाखिल की गयी है। 

यह भी तर्क किया गया है कि अपीलार्थी भूमि के एक भाग अर्जन के कारण ₹ 1,48,09,884 की धनराशि संदत्त की गयी है, जबकि प्रत्युत्तरदाता को यह आशंका है कि ऐसी धनराशि का अपीलार्थी के द्वारा दुर्विनियोजन किया जायेगा।

12. हमने पक्षकारों के विद्वान अधिवक्तागण को सुना है। हम यह पाते हैं कि विधि के प्रथम सारवान् पश्न के सम्बन्ध में उच्च न्यायालय के द्वारा पारित किया गया आदेश संधार्य नहीं है। संहिता की धारा 92 न्यास के विरुद्ध या तो किसी न्यासी को हटाने; नया न्यासी नियुक्त करने के लिये ; या न्यासी, 

आदि में किसी सम्पत्ति को निहित करने के लिये वाद का अनुचिन्तन करती है, परन्तु वर्तमान वाद स्वयं ही न्यास के द्वारा एक सेवादार के विरुद्ध है, इसलिये संहिता की धारा 92 के अधीन विहित प्रक्रिया न्यास के द्वारा वाद में प्रयोज्यनीय नहीं होगी। संहिता की धारा 92 पूर्त अथवा धार्मिक प्रकृति के सार्वजनिक प्रयोजन के लिये सृजित किसी अभिव्यक्त अथवा आन्वयिक न्यास के किसी अभिकथित भंग के मामले में व्यक्ति पर अधिकार प्रदत्त करती है। 

चूंकि न्यास स्वयं ही वादी था, इसलिये उच्च न्यायालय का निष्कर्ष स्पष्ट रूप में त्रुटिपूर्ण और संधार्य नहीं है। तथ्य यह है कि बाबा गोपाल दास को स्थायी व्यादेश के लिये पूर्ववर्ती वाद में किये गये कथन (प्रदर्श पी-1) के अनुसार सेवादार पाया गया है। इसलिये राम निवास को बाबा गोपाल दास के विधिक प्रतिनिधि के रूप में उससे बेहतर हित प्राप्त नहीं होगा, जो मूल प्रतिवादी में निहित था। राम निवास को लोक के सदस्य के रूप में मन्दिर में सेवा करते हुये पाया गया था। 

उच्च न्यायालय ने इस निष्कर्ष को अभिपुष्ट किया है कि राम निवास अपनी सेवायें प्रदान कर सकता था, परन्तु उसने यह साबित नहीं किया है कि उसे बाबा गोपाल दास के चेला के रूप में नियुक्त किया गया था। अग्रेतर लेखा-जोखा प्रदान करने के लिये डिक्री केवल मत बाबा गोपाल दास के विरुद्ध ही निष्पादित की जा सकती थी, इसलिये उसकी मृत्यु के पश्चात् ऐसी डिक्री निष्पादित नहीं की जा सकती है।

13. उसकी दृष्टि में, विधि के प्रथम सारवान् प्रश्न पर उच्च न्यायालय के निष्कर्ष को अपास्त किया जाता है और वाद को पोषणीय पाया जाता है तथा उसे प्रथम अपीलीय न्यायालय के द्वारा सही तौर पर डिक्रीत किया गया था। 

14. हम यह पाते हैं कि प्रत्यत्तरदाता की यह आशंका कि मुआवजे की धनराशि का दुरुपयोग किया जा सकता है, धार्य नहीं है। अपीलार्थी एक रजिस्ट्रीकृत सोसाइटी है। एक रजिस्ट्रीकृत सोसाइटी के रूप में पाला था का सांविधिक दायित्व है। हम यह पाते हैं कि ऐसी आशंका भ्रमित है और वह वर्तमान वाद तथा एसी कार्यवाही से उद्भूत अपील की व्याप्ति के परे हैं।

15. परिणामस्वरूप वर्तमान अपील अनज्ञात की जाती है। विधि के प्रथम सारवान प्रश्न के सम्बन्ध में उच्च न्यायालय के आदेश को अपास्त किया जाता है और वाद को डिक्रीत किया जाता है।

नोट : [ ज्ञानी लॉ द्वारा उक्त आदेशो का हिंदी रूपांतरण सिर्फ जन-सामान्य व् अधिवक्ता गणों को हिंदी में उक्त आदेशों को समझने हेतु प्रस्तुत किये जातें है इनका प्रयोग किसी भी विधिक कार्यवाही में करना त्रुटिपूर्ण होगा ]

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