नरेन्द्र कुमार तिवारी बनाम झारखण्ड राज्य

नरेन्द्र कुमार तिवारी बनाम झारखण्ड राज्य

(उच्चतम न्यायालय)
मदन बी लोकुर एवं दीपक गुप्ता, न्यायमूर्तिगण
सिविल अपील संख्या 7423-7429 वर्ष 2018
1 अगस्त 2018 को विनिश्चित

नरेन्द्र कुमार तिवारी एवं अन्य बनाम झारखण्ड राज्य एवं अन्य 

निर्णय

मदन बी लोकुर न्यायमूर्तिण्-अनुमति प्रदान की गयी।

2. ये अपीलें विभिन्न पदों पर दैनिक मजदूर अथवा संविदा कर्मकारों के नियमितीकरण के सम्बन्धित रिट याचिकाओं के समूह में झारखण्ड उच्च न्यायालय की खण्डपीठ के द्वारा पारित किये गये दिनांक 17 द्य नवम्बर 2016 के सामान्य निर्णय तथा आदेश से उद्भूत होती हैं। रिट याचीगण (अब अपीलार्थीगण) को झारखण्ड सरकार के अधीनस्थ अनियमित रूप से नियुक्त एवं कार्यरत कर्मियों की सेवा नियमितीकरण नियमावली 2015 (एतस्मिन्पश्चात् "नियमितीकरण नियमावली" के रूप में निर्दिष्ट) के प्रावधानों की दृष्टि में नियमितीकरण के लाभ से इन्कार किया गया था।

3. स्वीकृत स्थिति यह है कि अपीलार्थीगण राज्य सरकार के अनियमित रूप से नियुक्त किये गये कर्मचारी हैं। उन्होंने अपनी प्रास्थिति के नियमितीकरण की इस आधार पर ईप्सा की थी कि उन्होंने 10 वर्ष से अधिक की सेवा प्रदान की थी और इस कारण नियमितीकरण किये जाने के हकदार थे। उच्च न्यायालय ने यह विचार अपनाया था कि सचिव कर्नाटक राज्य एवं अन्य बनाम उमादेवी (3) एवं अन्य 2006

एस सी सी 1 : 2006 (2) एस सी सी डी 1096 (एस सी), के मामले में संवैधानिक पीठ का निर्णय उनके नियमितीकरण को अनुज्ञात नहीं करता था क्योंकि उन्होंने 10 अप्रैल 2006 की अन्तिम तारीख पर 10 वर्षों के लिये कार्य नहीं किया था जब संवैधानिक पीठ ने अपना निर्णय प्रदान किया था। 

उच्च न्यायालय के अनुसार नियमितीकरण नियमावली संवैधानिक पीठ के निर्णय के निबन्धनों में 10 अप्रैल 2006 की अन्तिम तारीख के आधार पर अनियमित रूप से नियुक्त किये गये कर्मचारियों की सेवा के नियमितीकरण के लिये एक बार के उपाय का प्रावधान करती थी। इसलिये चूंकि अपीलार्थीगण ने 10 वर्ष की सेवा पूरी नहीं की थी उन्हें नियमित नहीं किया जा सकता था।

4. अपीलार्थीगण ने उच्च न्यायालय के समक्ष यह तर्क किया था कि झारखण्ड राज्य को केवल 15 नबम्बर 2000 को सृजित किया गया था और इसलिये कोई भी व्यक्ति 10 अप्रैल 2006 की अन्तिम तारीख पर झारखण्ड राज्य की 10 वर्ष तक सेवा पूरा नहीं कर सकता था। इसलिये कोई भी व्यक्ति नियमितीकरण मावला का लाभ प्राप्त नहीं कर सकता था जिसने सम्पूर्ण विधायी प्रयोग को पूर्ण रूप से निरर्थक बना दिया अपालार्थीगण ने उच्च न्यायालय में यह इंगित किया था कि राज्य ने राज्य के कुछ कर्मचारियों को जिन्होंने राज्य में प्रत्यक्षतः 10 वर्ष की सेवा पूरी नहीं की थी नियमितीकरण अनुज्ञात करते हुये 18 जुलाई,

Narendra Kumar Tiwari vs State of Jharkhand

2009 और 19 जुलाई , 2009 का संकल्प जारी किया था। परिणामस्वरूप यह निवेदन किया गया था कि अपीलार्थीगण के साथ उनकी किसी त्रुटि के बिना यह अतार्किक रीति में भेदभाव किया गया था। 

5. पक्षकारों के विद्वान अधिवक्तागण को सुनने के पश्चात तथा उमादेवी (3) के वाद में संवैधानिक पीठ के निर्णय के साथ ही साथ कर्नाटक राज्य एवं अन्य बनाम एम० एल० केशरी एवं अन्य (2010) 9 एस सीसी 247. के मामले में उमादेवी (3) के वाद को स्पष्ट करते हुये इस न्यायालय के पश्चात्वर्ती निर्णय पर विचार करने के पश्चात् हमारा यह विचार है कि उच्च न्यायालय ने उमादेवी (3) के वाद में निर्देशों के साथ ही साथ केशरी के वाद में उसके विचारण पर अव्यावहारिक अभिमत ग्रहण करने में गलती की है।

6. उमादेवी (3) के वाद में निर्णय अनियमित रूप से अथवा अवैधानिक रूप से दैनिक मजदूर कर्मकारों को नियुक्त करने और उन्हें अनिश्चित रूप से जारी रखने की हानिकारक प्रथा को समाप्त करने के लिये आशयित था। वास्तव में, रिपोर्ट के पैरा 49 में यह इंगित किया गया था कि विधि का शासन नियुक्तियों को संवैधानिक रीति में किये गये जाने की अपेक्षा करता है,

और राज्य को सार्वजनिक नियोजन के मामले में अनियमितता कारित करने के लिये अनुज्ञात नहीं किया जा सकता है, जो प्रतिकूल रूप से उन व्यक्तियों को प्रभावित करेगी, जिन्हें संवैधानिक योजना के निबन्धनों में नियोजित किया जा सकता था। इसी कारण से यह है कि एक बार की युक्ति और अन्तिम तारीख की अवधारणा को इस आशा तथा प्रत्याशा में प्रस्तावित किया गया था कि राज्य अनियमित अथवा अवैध नियुक्तियों को करना बन्द कर देगा और अवरुद्ध हो जायेगा तथा इसके बजाय नियमित आधार पर नियुक्तियां की जायेंगी।

7. एक बार की युक्ति की अवधारणा को अग्रेतर केशरी के वाद में निर्णय के पैरा 9 10 और 11 में स्पष्ट किया गया था जो निम्न प्रकार से पठित हैं

            "9 पद "एक बार की युक्ति" को उसके उचित परिप्रेक्ष्य में समझा जाना होगा। इसका सामान्यतः तात्पर्य यह होगा कि उमादेवी (3) के वाद में निर्णय के पश्चात्, प्रत्येक विभाग अथवा प्रत्येक परिकरण को एक बार का प्रयोग करना चाहिये और सभी आकस्मिक, दैनिक मजदूर अथवा तदर्थ कर्मचारियों जो 10 वर्ष से अधिक समय से कार्य कर रहे हों, की न्यायालयों तथा अधिकरणों के हस्तक्षेप के बिना सूची तैयार की जानी चाहिये और उनका यह सत्यापन किया जाना चाहिये कि क्या वे रिक्त पदों के विरुद्ध कार्य कर रहे हैं और पद के लिये अपेक्षित योग्यता धारित करते हैं और यदि ऐसा है तो, तो उनकी सेवाओं को नियमित किया जाना चाहिये।

10. उमादेवी (3) का वाद में निर्णय की तारीख से छह माह की समाप्ति पर विभिन्न दैनिक मजदुर/तदर्थ/आकस्मिक कर्मचारियों के मामले अभी भी न्यायालयों के समक्ष लम्बित थे। परिणामस्वरूप अनेक विभागों और परिकरणों ने एक बार की नियमितीकरण की प्रक्रिया को प्रारम्भ नहीं किया था। दूसरी तरफ कुछ शासकीय विभागों तथा परिकरणों ने विभिन्न कर्मचारियों को या तो इस आधार पर कि उनके मामले न्यायालयों में लम्बित थे या मात्र अनदेखी के कारण विचारण से अपवर्जित करते हये एक बार का प्रयोग किया था। 

ऐसी परिस्थितियों में कर्मचारीगण जो उमादेवी (3) के वाद में निर्णय के पैरा 53 के निबन्धनों में विचार किये जाने के हकदार थे मात्र इस कारण से नियमितीकरण के लिये विचार किये जाने के अपने अधिकार को नहीं खोयेंगे कि उनके मामलों पर विचार किये बिना एक बार का प्रयोग पर्ण किया गया था अथवा इस कारण से कि उमादेवी (3) के वाद के पैरा 53 में। उल्लिखित छह माह की अवधि समाप्त हो गयी है। एक बार के प्रयोग को ऐसे सभी दैनिक मजदुर/तदर्थ/आकस्मिक कर्मचारियों पर विचार करना चाहिये, जिन्होंने न्यायालयों अथवा अधिकरणों के। 

Narendra Kumar Tiwari vs State of Jharkhand judgment hindi

किसी अन्तरिम आदेश के संरक्षण का उपयोग किये बिना 10/4/2006 को यथाविद्यमान 10 वर्ष की निरन्तर सेवा की थी। यदि कोई नियोजक ने उमादेवी (3) के वाद के पैरा 13 के निबन्धनों में एक बार का प्रयोग किया था परन्तु  ऐसे कछ कर्मचारियों के मामलों पर विचार नहीं किया था जो उमादेवी (3) के वाद के पैरा 53 के लाभ के हकदार थे सम्बद्ध नियोजक को उनके मामलों पर भी एक बार के प्रयोग को निरन्तरता के रूप में विचार करना चाहिये। एक बार का प्रयोग केवल तब ही पूर्ण किया जायेगा, जब एसे सभी कर्मचारियों, जो उमादेवी (3)ध के वाद के पैरा 53 के निबन्धनों में विचार किये जाने के हकदार हो, उन पर इस प्रकार विचार किया जाता है।

11. उमादेवी (3) के पैरा 53 में उक्त निर्देश के पीछे उद्देश्य द्विमुखी है। पहला यह सुनिश्चित करना है कि वे व्यक्ति जिन्होंने उमादेवी (3) के वाद में निर्णय प्रदान करने की तारीख के पहले चालया अथवा अधिकरणों के किसी अन्तरिम आदेश के संरक्षण के बिना 10 वर्ष से अधिक की सेवा पूरी की है उन पर उनकी लम्बी सेवा की दृष्टि में नियमितीकरण के लिये किया जाता है। 

दूसरा यह सुनिश्चित करना है कि विभाग/परिकरण लम्बी अवधि के लिये दैनिक मजदुर/तदर्थ/आकस्मिक आधार पर व्यक्तियों को नियोजित करने की प्रथा को और तब आवर्ती ने उन्हें इस आधार नियमित करने की प्रथा को कि उन्होंने 10 वर्ष से अधिक की सेवा की है स्थायी नहीं बनाते है, तदद्वारा भी और नियक्ति से सम्बन्धित संवैधानिक अथवा सांविधिक पावों को विफल बनाते है, निर्देश का वास्तविक प्रभाव यह है कि सभी व्यक्ति, 

जिन्होंने अपेक्षित अर्हताधारित करते हुय रिक्त पदो में किसी न्यायालय अथवा अधिकरण के किसी अन्तरिम आदेश के संरक्षण के बिना 10/4/2006 को [ उमादेवी (3) के वाद में निर्णय की तारीख ] पर यथा विद्यमान 10 वर्ष से अधिक समय तक कार्य किया हों, नियमितीकरण के लिये विचार किये जाने के हकदार हैं। यह तथ्य कि नियोजक न उमादेवी (3) के वाद में निर्णय के छह माह के भीतर नियमितीकरण का ऐसा प्रयोग नहीं किया है अथवा यह कि ऐसा प्रयोग केवल कुछ ही सीमित लोगों के लिये किया गया था ऐसे कर्मचारियों को एक बार के उपाय के रूप में उमादेवी (3) का वाद में उक्त निर्देशों के निबन्धनों में नियमितीकरण के लिये विचार किये जाने के अधिकर के लिये अहकदार नहीं बनायेगा।

8. इसलिये उमादेवी (3) के वाद में निर्णय का प्रयोजन और आशय द्विमखी था अर्थात भविष्य में अनियमित अथवा अवैध नियुक्तियों को निवारित करना और दूसरा उन व्यक्तियों को जिन्हें अतीत में अनियमित रूप से नियुक्त किया गया था, लाभ प्रदान करना है। यह तथ्य कि झारखण्ड राज्य ने उमादेवा (3) क वाद म निर्णय के पश्चात लगभग एक दशक तक अनियमित नियक्तियां करना जारी रखा था. इस बात का स्पष्ट संकेत हैं कि वह यह विश्वास करता है कि अनियमित नियक्तियों को जारी रखना और जब कभी । आवश्यक हो, अनियमित रूप से नियुक्त किये गये कर्मचारियों की सेवा को इस आधार पर समाप्त कर देना कि उन्हें अनियमित रूप से नियुक्त किया गया था सही था यह कुछ नहीं, अपितु कर्मचारियो  का उन्हें । नियमितीकरण का लाभ प्रदान न करके और उन्हें उनके सिर पर डैमोसेल्स की तलवार रख करके उनका शोषण का एक रूप है। यह संक्षिप्त रूप में वही है जिसे उमादेवी (3) के वाद और किशोरी के वाद में विवादित किये जाने की ईप्सा की गयी थी।


9. यदि उमादेवी (3) के वाद में संवैधानिक पीठ के निर्णय की भावना को भुलाते हुये कठोर तथा शाब्दिक निर्वचन पर विचार किया जाना हो तब झारखण्ड राज्य के अनियमित रूप से नियुक्त किये गये किसी भी कर्मचारी को कभी भी नियमित नहीं किया जा सकता था क्योंकि राज्य केवल 15 नवम्बर 2000 को ही अस्तित्व में आया था और अन्तिम तारीख 10 अप्रैल, 2006 के रूप में नियत की गयी थी। अन्य शब्दों में इस रीति में अनियमित रूप से नियुक्त किये गये कर्मचारियों को अनिश्चित रूप से जारी रखने की यह हानिकारक प्रथा संवैधानिक पीठ के आशय के प्रतिकूल जारी रखी जायेगी।

10. उच्च न्यायालय के साथ ही साथ झारखण्ड राज्य को सम्पूर्ण विवाद्यक पर सन्दर्भात्मक परिप्रेक्ष्य में न केवल राज्य के हित वित्तीय अथवा अन्यथा पर विचार किया जाना चाहिये कर्मचारियों के हित को भी ध्यान में रखा जाना आवश्यक है। झारखण्ड राज्य के द्वारा अन्ततः जो प्राप्त किया गया है वह नियमित नियुक्तियों की प्रक्रिया का लघु रास्ता है और इसके बजाय अनियमित आधार पर नियुक्तियों को करना है। यह अच्छा शासन नहीं है।

11. इन परिस्थितियों के अधीन हमारा यह विचार है कि नियमितीकरण नियमावली को आनभविक निर्वचन प्रदान किया जाना चाहिये और अपीलार्थीगण को यदि उन्होंने नियमितीकरण नियमावली के प्रारम्भ की तारीख से 10 वर्ष की सेवा पूरी कर ली हों उनके द्वारा प्रदान की गयी सेवा का लाभ प्रदान किया जाना चाहिये। यदि उन्होंने सेवा के 10 वर्ष पूरे कर लिये हों उन्हें नियमित किया जाना चाहिये जब तक उनके नियमितीकरण के प्रति कोई वैध आपत्ति जैसे दुराचरण आदि न हो।

12. उच्च न्यायालय के द्वारा पारित किया गया आक्षेपित निर्णय तथा आदेश हमारे निष्कर्षों की दृष्टि में। अपास्त किया जाता है। राज्य को अपीलार्थीगण की प्रास्थिति के नियमितीकरण पर आज से चार माह के भीतर निर्णय लेना चाहिये।

13. अपीलें तद्नुसार निस्तारित की जाती हैं।

नोट : [ ज्ञानी लॉ द्वारा उक्त आदेशो का हिंदी रूपांतरण सिर्फ जन-सामान्य व् अधिवक्ता गणों को हिंदी में उक्त आदेशों को समझने हेतु प्रस्तुत किये जातें है इनका प्रयोग किसी भी विधिक कार्यवाही में करना त्रुटिपूर्ण होगा ]

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