सिविल केस क्या होता है | सिविल कोर्ट की प्रक्रिया

सिविल केस क्या होता है | सिविल कोर्ट की प्रक्रिया

नमस्कार ज्यादातर कोर्ट केस के वारे मे कोई वात सुनने के वाद हमारे दिमाग मे चोरी डकैती हत्या या फिर वलात्कार ऐसे केस के वारे मे विचार आते है।

लेकिन कोर्ट सिर्फ अपराधिक मामलो पर ही विचार नही करती। इसके अलावा कोर्ट मे सिविल जिसे हिन्दी मे व्यवहार कहा जाता है से सम्बन्धित मामले भी आते है।

तो आज हम ऐसे ही मुकद्मे यानी केस के वारे मे समझेगे की सिविल और अपराधिक मामलो मे क्या अन्तर होता है और सिविल मामले किन परिेस्थितियो मे कोर्ट मे दायर किये जा सकते है और सिविल केस की कोर्ट मे क्या प्रोसेस होेती है।

सिविल केस क्या होता है ।

कोर्ट सामान्यतः दो प्रकार के मामलो पर विचार करता है एक अपराधिक मामले और दूसरा सिविल या किहे तो व्यवहार मामले।

सिविल केस और क्रिमिनल केस मे क्या अन्तर होता हेै

आपराधिक मामले वे मामले होते है जिसमे किसी व्यक्ति द्वारा कोई ऐसा कार्य किया गया है जिसे विधी द्वारा दण्डनीय वनाया गया है।

यानी जिनके लिए किसी प्रकार की सजा का प्रावधान हेै जैसे चोरी हत्या डकैती हत्या की कोशिश और भी कई ऐसे अपराध जिनमे सजा का प्रावधान है। सिविल केस क्या होता है

आपराधिक मामलो मे शिकायत दर्ज करने वाले का उद्देश्य हमेशा अपराधी को सजा दिलाना होता है । लेकिन सिविल मामलो मे ऐसा नही है।

सिविल मामले ऐसे अधिकारो के सम्वन्ध मे दायर होते है जिसमे किसी व्यक्ति द्वारा आपके किसी हक या किसी अधिकार सम्पत्ति आदि को किसी प्रकार से प्रभावित किया जाता है तव ऐसे मे सिविल मुकदमो का सहार लिया जाता है।

सिविल मामले मे जैसे जमीन से सम्वन्धित विवाद जैसे कोई आपकी जमीन पर कव्जा करना चाहता है तो  उसे रोकने के लिए वाद और अगर किसी ने कव्जा कर लिया है।

तो अपना कव्जा वापस पाने के लिए वाद वटवारे के सम्वन्ध मे वाद विजनेस पार्टनरशिप से सम्वन्धित वाद आदि ऐसे मुकदमे जिनमे कहीं कोई सम्पत्ति से सम्बन्ध है।

या किसी रकम से इस तरह के मुकदमे सिविल मुकदमे होते है या किसी अधिकार के सम्वन्ध मे किये गये मुकदमे सिविल प्रक्रति के होते है जैसे तीन तलाक पर आया निर्णय एक सिविल प्रक्रति के मुकद्मे से सम्वन्धित है। सिविल केस क्या होता है

सिविल कोर्ट मे केस किस तरह फाइल होता है

सिविल कार्ट मे केस फाइल करने के लिए एक प्रोसेस का पालन करना होता है विधि द्वारा एक प्रक्रिया वनाई गई है और उस प्रक्रिया के आधार पर ही सिविल केस चलते है।

आपकी जानकारी के लिए वता दूं कि सिविल मुकदमो से सम्वन्धित प्रक्रिया के वारे मे सिविल प्रक्रिया संहिता 1908 मे प्रावधान किये गये  है जिसे अंग्रेजी मे  सिविल प्रोसिजर कोर्ड 1908 कहते है।

कार्ट केस के लिए वकील करना क्यो आवश्यक है

वैसे तो कोर्ट मे किसी भी तरह के केस को लडने या कहे तो उस केस मे अपना पक्ष रखने के लिए एक ऐडवोकेट की जरूरत होती है क्योकि एक अधिवक्ता मुकदमे से सम्बन्धित पूर्ण प्रक्रिया को जानता है। 

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इसी लिए क्योकि एक आम नागरिक जिसे विधी की विशेष जानकारी नही होती अपना पक्ष आसानी से कार्ट के सामने नहीं रख सकता इसी लिए कार्ट मे अधिवक्ता या वकील को नियुक्त किया जाता है।

ताकी वह कार्ट मे सारी प्रक्रियाओ को ध्यान मे रखकर अपने पक्षकार का पक्ष रखें। लेकिन ऐसा नही है कि आम आदमी या कोई ऐसा व्यक्ति जो अधिवक्ता नही है। सिविल केस क्या होता है

उसे ऐसे प्रोसेस को नही जानना चाहिए क्योकि ज्ञान कभी भी व्यर्थ नही होता जानकारी जितनी हो कम होती है।

वादी और प्रतिवादी क्या होता है।

सिविल मुकदमे मे जिस व्यक्ति द्वारा कार्ट मे  केस दायर यानि फाइल किया जाता है वह वादी पक्ष यानी प्लेन्टिफ कहलाता है और जिस व्यक्ति के खिलाफ मुकदमा दायर किया जाता है वह प्रतिवादी यानी डिफैन्डेन्ट कहलाता है।

दावा या वादपत्र किसे कहते है

अव यहाॅ जव किसी व्यक्ति द्वारा कोर्ट मे केस फाइल किया जाता है तो ऐसे मे एक लिखित दावा तैयार किया जाना चाहिए जिसमे न्यायालय का नाम जिन व्यक्तिियो द्वारा मुकदमा दायर किया जा रहा है।

उन सभी का नाम व पूरा पता इसी के साथ जिन व्यक्तियो के खिलाफ मुकदमा दायर किया गया है यानी प्रतिवादी उन सभी का नाम व पूूरा पता होना चाहिए।

सिविल कोर्ट मे एक साथ कितने व्यक्ति केस फाइल कर सकते है

सिविल प्रक्रति के किसी भी मुकदमे मे वादी एंव प्रतिवादियो कि सख्या के सम्वन्ध मे कोई रोक नही है एक साथ कितने भी वादी मुकदमा दायर कर सकते है।

और एक साथ एक ही मुकदमे मे कितने भी प्रतिवादी वनाये जा सकते है किन्तू प्रत्येक वादी व प्रतिवादी का उस मुकदमे मे हित होना आवश्यक है । सिविल केस क्या होता है

तो ऐसे मे वादी द्वारा अपने दावे मे वादी व प्रतिवादी के नाम व पते और इसी के साथ वादी को अपने अधिकार की हानी से सम्वधित सभी तथ्यो को न्यायालय के समक्ष लिखित रूप मे देनी होती है।

कोर्ट जव ऐसे दावे को प्राप्त कर लेता है तो प्रतिवादी यानी जिनके खिलाफ मुकदमा दायर किया गया है उन व्यक्तियो को समन भेजती है कि वह दावे के सम्बन्ध मे अपना पक्ष आकर न्यायालय मे रखे।

सम्मन क्या है

सम्मन कार्ट द्वारा दिया गया एक लिखित आदेश होता है जो सम्मन प्राप्त करने वाले व्यक्ति यानी जिस व्यक्ति के खिलाफ ऐसा सम्मन जारी किया गया है। को यह सूचना देता है,

कि आपके विरूध कोर्ट मे एक मुकदमा दर्ज कराया गया है और इस मुकदमे के सम्वन्ध मे आप अगली नियत दिनांक पर आकर अपना पक्ष रखे।

सम्मन कार्ट द्वारा जव भी जारी किया जाता है तो सम्मन पर मुकदमे की सख्या मुकदमे के पक्षकार के नाम दिनाक व समय जिस दिनांक को प्रतिवादी को कार्ट मे हाजिर हेाना है कोर्ट की मोहर तथा मुकदमे का प्रकार ये सारी वाते सम्मन पर लिखित होती है।

यहाॅ अगर इस प्रकार का सम्मन प्रतिवादी प्राप्त कर लेता है तो अगली तारीख जो सम्मन मे दी गई है पर प्रतिवादी अपने वकील के द्वारा कोर्ट मे अपना पक्ष रखता है।

प्रतिवादी को कोर्ट मे अपना पक्ष रखने के लिए वादी के दावे का लिखित मे जवाव देना होता है जिसे लिखित कथन कहते है इस लिखित कथन के माध्यम से प्रतिवादी वादी के दावे मे दी गई सभी वातो का जवाव देता है। 

- समन क्या है और पढ़े 

इशूज क्या है

कोर्ट जव प्रतिवादी के द्वारा प्रस्तुत ऐसे लिखित कथन को प्राप्त कर लेता है तव वह वारिकी से जाॅच कर दोनो पक्षो के वीच विवाद को लिखित रूप मे तय कर लेता है।

आसान भाषा मे अगर कहूॅ तो कोर्ट वादी के वादपत्र और प्रतिवादी के लिखित कथन को देखने के वाद मेन विवाद यानि असली झगडे के मुददे केा अलग से नोट कर लेता है।

जिसे केार्ट की भाषा मे इशूज कहते है असल मे कोर्ट यह देखता है कि आखिर तय क्या होना है कोर्ट को किन किन विषेश वातो पर विचार करना है।

ऐसे विन्दुु वनाने के वाद कोर्ट ऐसे विन्दू वनाते समय कुछ विधिक यानी कानूनी विन्दू भी वनाती है जैसे कि क्या इस न्यायालय को इस प्रकार का केस सुनने का अधिकार है या नही , क्या वादी ने जिस सम्पत्ति के वारे मे केस किया है उसका मूल्यांकन ठीक किया है या नही।

वाद का मूल्यांकन क्या होता है

यहाॅ मूल्यांकन से मतलव उस सम्पत्ति की कीमत से है वादी को अपने वाद  मे जिस सम्पत्ति के सम्वन्ध मे केस किया है उसकी कीमत लिखनी होती है।

और इसी के साथ कोर्ट यह भी विन्दू वनाती है कि अगर मूल्यांकन ठीक किया गया है तो क्या वादी के द्वारा आवश्यक कोर्ट फीस कोर्ट मे दाखिल कर दी गई है।

कोर्ट फीस क्या होती है 

यहा एक वात वता दू सिविल प्रक्रति के मुकदमो मे कोर्ट आप जिस भी सम्पत्ति के वारे मे केस लडना चाहते है उस सम्पत्ति की कीमत के आधार पर कोर्ट फीस लेती है जो आपको केस फाइल करते समय कोर्ट मे देेनी होती है। सिविल केस क्या होता है

इन सभी विन्दुओ पर विचार करने के वाद यदि कोर्ट फीस आदि पूर्ण रूप से दे दी गई है तो कार्ट मुकदमे को गवाही की ओर ले जाती है।

कार्ट मे गवाही कैसे होती है

सिविल मुकदमो मे गवाही पस्तुत करने से पूर्व कोर्ट मे गवाहो की एक सूची दखिल की जाती है जिसमे सभी गवाहो के नाम व पतो का विवरण देना होता है।

यहाॅ कोर्ट गवाही प्रस्तुत करने का अवसर पहले वादी पक्ष को देता है । जिसमे वादी एक एक करके अपने सभी गवाहो को कोर्ट मे वुलाकर उनसे गवाही प्रस्तूत कराता है।

वादी द्वारा प्रस्तूत किये गये किसी भी गवाह से प्रतिवादीगण को जिरह करने का अवसर प्रदान किया जाता है। 

अभी पढ़े - गबाह के कितने प्रकार होते है?

जिरह क्या है।

जिरह के अवसर से मतलव है कि प्रतिवादी के अधिवक्ता को यह अवसर प्रदान किया जाता है कि वह वादी के ऐसे गवाह से जो कोंर्ट मे उपस्थित है सवाल पॅॅूछ सकता है।

और वह वादी के गवाह से सच या झूठ को सावित किये जाने के लिए गवाह से मुकदमे से सम्बन्धित या जिस सम्पत्ति के सम्बन्ध मे केस दायर किया गया है उस से सम्वन्धित प्रश्न पूॅछ सकता है ।

इस तरह हर वार वादी द्वारा अपना गवाह प्रस्तुत करने के वाद प्रतिवादी के वकील को जिरह का अवसर दिया जाता है। सिविल केस क्या होता है

 यहाॅ जव वादी द्वारा अपने सभी गवाहो को प्रस्तुत कर दिया जाता है तव कोर्ट प्रतिवादी यानी जिसके खिलाफ मुकदमा दायर किया गया था को अपने गवाह प्रस्तुत करने का मौका देती है।

यहाॅ भी जिरह के सम्बन्ध मे वही प्रक्रिया होती है पर इस वार अधिवक्ता वादी पक्ष का होता है। यहा जव प्रतिवादी अपने किसी गवाह को प्रस्तूत करता है तो वादी के अधिवक्ता को ऐसे गवाह से जिरह करने का मौका प्राप्त होता है।

इन सभी प्रक्रियाओ के पूर्ण हो जाने के वाद जव कोर्ट दोनो पक्षो के अधिवक्ताओ यानी वकीलो की वहस को सुनता है और वादी व प्रतिवादी दोनो पक्ष की वहस सुनने के वाद और पूरे मामले की पूर्ण रूप से जाॅच करने के वाद कोर्ट अपना फैसला सुनाती है ।

तो ये था सिविल मुकदमे का पूरा प्रोसेस लेकिन यह सिविल कोर्ट का प्रोसेस है इस प्रकार के निर्णय हो जाने के वाद जिस पक्ष के खिलाफ ऐसा आदेश किया जाता है वह अपील मे भी जाकर उस आदेश को चैलेंज कर सकता है।

धन्यवाद।  

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1 Comments:

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14.10.21 ×

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