अली हुसैन वनाम राबिया एवं अन्य

अली हुसैन वनाम राबिया एवं अन्य 

(उच्चतम न्यायालय)
एन० वी
० रमना, मोहन एम० शांतानागौदार एवं अजय रस्तोगी, न्यायमूर्तिगण
सिविल अपील संख्या 7137 वर्ष 2010
17 सितम्बर, 2019 को विनिश्चित 

अली हुसैन (मृत) द्वारा विधिक प्रतिनिधिगण 

वनाम 

राबिया एवं अन्य

निर्णय

अजय रस्तोगी न्यायमूर्ति. - यह अपील उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय द्वारा द्वितीय अपील संख्या 1341 वर्ष 2001 में पारित निर्णय और डिक्री दिनांक 18 अगस्त, 2008 के विरुद्ध निदेशित है।

2. संक्षेप में तथ्य यह हैं कि प्रथम प्रत्युत्तरदाता-वादी ने 22 मई 1995 को उपनिबन्धक कार्यालय जगदारी, रुडकी में रजिस्ट्रीकृत विक्रय-विलेख दिनांक 10 मई, 1995 के निरस्तीकरण के लिये प्रतिवादीअपीलार्थी के विरुद्ध एक वाद दाखिल किया था। वादपत्र के अनुसार वादी.प्रथम प्रत्युत्तरदाता श्रीमती राबिया ने वादपत्र के अन्त में इंगित सम्पत्ति की अनुसूची में दर्शित संपत्ति उत्तराधिकार में अपने पिता स्वर्गीय श्री अहमद से प्राप्त की थी और प्रश्नगत वाद सम्पत्ति की स्वामिनी है और उस पर काबिज है। अग्रेतर यह प्रकथन किया गया था कि वाद में पक्षकार बनाये गये प्रतिवादीगण (प्रतिवादी संख्या 1 और 3, अली हसैन और अब्दुल हसन) उसके परदादा के पुत्र हैं और पक्षकार बनायी गयी प्रतिवादी संख्या 2 श्रीमती राकिबा अली हुसैन (प्रतिवादी संख्या 1 पक्षकार बनाया गया) की पत्नी है।
 
3. वादपत्र में यह प्रकथन किया गया था कि पक्षकार बनाये गये प्रतिवादी संख्या 1 (अपीलार्थी) ने वादी-प्रत्युत्तरदाता की वाद सम्पत्ति को कब्जा करने के लिये वादी-प्रथम प्रत्युत्तरदाता के नाम में 25 अप्रैल, 1995 को एक कूटरचित रजिस्ट्रीकृत मुख्तारनामा तैयार करवाया था और कूटरचित मुख्तारनामा के आधार पर 10 मई, 1995 को प्रतिवादी संख्या 2 एवं 3 (श्रीमती राकिबा एवं अब्दुल हसन) के पक्ष में ₹ 1,50,000 प्रतिफल के लिये रजिस्ट्रीकृत विक्रय-विलेख द्वारा वाद सम्पत्ति विक्रय कर दी थी। वादी-प्रथम प्रत्युत्तरदाता के अनुसार वाद सम्पत्ति का विक्रय मूल्य ₹ 3,00,000 से कम नहीं हो सकता था। वादपत्र में यह भी अभिकथन किया गया है, कि एसा काई वर्णन नहीं है कि वास्तव में विक्रय प्रतिफल किसने प्राप्त किया था। और वाद सम्पत्ति पर उसका वास्तविक कब्जा है और कूटरचित विक्रय-विलेख को कभी भी प्रभाव में नहीं लाया गया था। कपट द्वारा आभिप्राप्त मुख्तारनामा और विक्रय-विलेख के निरस्तीकरण की डिक्री के लिये प्राथना की गयी थी।

4. विचारण न्यायालय के समक्ष, पक्षकारों के अभिवचनों के आधार पर निम्नलिखित विवधक विरचित किये गये थे :
  1. क्या प्रतिवादी संख्या 2 एवं 3 के पक्ष में प्रतिवादी संख्या 1 द्वारा निष्पादित विक्रय-विलेख दिनांक 10.5.1995 वादपत्र में दिये गये आधारों पर निरस्त किये जाने के लिये दायी है?
  2. क्या प्रतिवादी संख्या 1 के पक्ष में वादी द्वारा निष्पादित कथित मुख्तारनामा दिनांक 25.4.1995, कटरचित दस्तावेज है और वादी ने उसे निष्पादित नहीं किया था?  यदि ऐसा है, उसका प्रभाव?
  3. क्या विक्रय-विलेख के सम्बन्ध में वादी ने प्रतिवादी संख्या 2 एवं 3 के पक्ष में प्रतिवादी संख्या 1 से विक्रय-प्रतिफल प्राप्त किया था?
  4. क्या वादी वादग्रस्त सम्पत्ति का स्वामी और काबिज है?
  5. क्या वादी किसी अनुतोष के लिये अधिकत है?
  6. क्या मोहम्मद मतीन को वादी द्वारा वादग्रस्त सम्पत्ति के विक्रय के बाद, वाद निष्फल हो गया था?
  7. क्या वाद विबन्ध और उपमति के सिद्धान्त द्वारा वर्जित है?
  8. क्या लिखित कथन के पैरा संख्या 13क में उद्भूत प्रतिविरोध की दृष्टि में वाद निष्फल हो गया था?
5. दोनों पक्षकारों ने अपनी प्रतिरक्षा के समर्थन में मौखिक और दस्तावेजी साक्ष्य प्रस्तुत किये थे। विचारण न्यायाधीश ने पक्षकारों को सुनने और अभिलेख पर साक्ष्य पर विचार करने के बाद, निर्णय और डिक्री दिनांक 19 जनवरी, 2001 के द्वारा वादी.प्रथम प्रत्युत्तरदाता द्वारा दाखिल वाद खारिज कर दिया था जिसे अग्रेतर वादी-प्रथम प्रत्युत्तरदाता की प्रेरणा पर प्रथम अपील में चुनौती दी गयी थी, जिसे निर्णय और डिक्री दिनांक 27 अगस्त, 2001 द्वारा निरस्त कर दिया गया था। अग्रेतर उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय के समक्ष द्वितीय अपील में उसे चुनौती दी गयी थी।

6. यह उल्लेख करना सुसंगत हो सकता है कि द्वितीय अपील की स्वीकृति के समय, उच्च न्यायालय ने निम्नलिखित विधि के सारवान प्रश्नों पर अपील को स्वीकार किया था ।
  1.  क्या दोनों अवर न्यायालय, इस नकारात्मक तथ्य को साबित करने का भार कि मुख्तारनामा उसके द्वारा निष्पादित नहीं है, वादीध्अपीलार्थी पर अन्तरित करने में न्यायोचित्य थे?
  2.  क्या साबित करने का भार अन्तरिती पर होता है जब अन्तरक स्वयं द्वारा विलेख के निष्पादन से। पूर्णत: इन्कार करता है? यदि ऐसा है, उसका प्रभाव?
7. पक्षकारों को सनने के बाद उच्च न्यायालय ने इस आधार वाक्य के आधार पर कार्यवाही की थी कि वादी-प्रथम प्रत्युत्तरदाता पर्दाशीन अशिक्षित महिला थी आर मु० खरबूजा क्वेर बनाम जंगबहादुर राय एवं अन्य, ए आई आर 1963 एस सी 1203, में इस न्यायालय क निर्णय का उल्लेख करते (फरीद-उन-निसा (वादी) बनाम मुख्तार अहमद एवं एक अन्य (प्रतिवादागण), ए आई आर 1925 पी 204), में प्रिवी कौंसिल के निर्णय पर विश्वास व्यक्त करते हुए निर्णीत किया था कि ऐसे वाद में सबूत का भार उन पर नहीं होता है जो आक्रमण करते हैं, किन्तु उन पर होता है जो विलेख पर आधारित होते और सबूत को सकारात्मक रूप से और निश्चयात्मक रूप में दर्शित करने तक होना आवश्यक है कि न केवल विलेख निष्पादित किया गया था, बल्कि स्पष्ट किया गया था और प्रदान करने वाले द्वारा वास्तव में समझा गया था।
 
8. उच्च न्यायालय ने निर्णीत किया था कि यह साबित करने का भार कि अभिकथित मुख्तारनामा कपट और 
 दुर्व्यपदेशन का परिणाम नहीं है, अपीलाथी.=-प्रतिवादी के कन्धे पर जाता है क्यूंकि वे लाभार्थी हैं और विचारण न्यायालय तथा प्रथम अपीलीय न्यायालय ने वादी-प्रथम प्रत्युत्तरदाता के कन्धों पर भार को अंतरित करने में स्पस्ट त्रुटि कारित की है और तदनुसार अवर न्यायालयो का निर्णय और डिक्री अपास्त कर दिया था और उच्च न्यायालय द्वारा आपेक्षित निर्णय दिनांक 18 अगस्त, 2008 में जो हमारे समक्ष अपीलार्थी-प्रतिवादी संख्या 1 की प्रेरणा पर चनौती की विषयबस्तु है, किये गये संप्रेक्षणो को ध्यान में रखते हुए अभिलेख पर उपलब्ध साक्ष्य की दृस्टि में नए सिरे वाद विनिश्चय करने के लिए विचारण न्यायाधीश को मामला वापस प्रेषित कर दिया था।

Ali Hussain vs Rabiya and others Judgment hindi

 9. इस न्यायालय ने 14 नवम्बर, 2008 को नोटिस जारी करते समय आक्षेपित निर्णय दिनांक 18 अगस्त 2008 का प्रवर्तन स्थगित कर दिया था।

10 अपीलार्थीगण के विद्वान अधिवक्ता निवेदन करते हैं कि मूल आधार जिस पर उन कार्यवाही की है, यह कि वादी-प्रथम प्रत्युत्तरदाता एक पर्दानशीन अशिक्षित महिला थी और यह स्थापित करने का भार अपीलार्थी-प्रथम प्रत्युत्तरदाता के कन्धे पर अन्तरित करते हुये यह स्थापित करने के लिये कि दस्तावेज वादी-प्रथम प्रत्युत्तरदाता को स्पष्ट किया गया था और उसने उसे समझ लिया था और तत्पश्चात संव्यवहार किया गया था अभिलेख पर अभिवचनों के विरुद्ध है। 
 
वादी-प्रथम प्रत्युत्तरदाता द्वारा दाखिल अभिलेख पर वादपत्र की प्रति, संलग्नक पी.1 के परिशीलन से, यह कहीं भी अभिवचन नहीं किया गया है कि वह एक पर्दानशीन अशिक्षित महिला थी और जिसके अभाव में, मूल प्रतिपादना, जिसकी उच्च न्यायालय द्वारा आक्षेपित निर्णय के अधीन परीक्षा की गयी है। असंधार्य है और जहां तक विवाद्यक, जो अभिलेख पर अभिवचनों के आधार पर विचारण न्यायाधीश द्वारा विरचित किये गये हैं सभी वादी.प्रथम प्रत्युत्तरदाता के विरुद्ध इन्कार किये गये हैं और दी हई परिस्थितियों में प्रतिपादित सिद्धान्तों के आधार पर उसे यह दुबारा विचार करने के लिये विचारण न्यायालय को मामला प्रेषित करने में उच्च न्यायालय द्वारा अभिलिखित निष्कर्ष में इस न्यायालय द्वारा हस्तक्षेप किया जाना आवश्यक है।

11. इसके विपरीत, प्रत्युत्तरदातागण के विद्वान अधिवक्ता ने आक्षेपित निर्णय के अधीन उच्च न्यायालय द्वारा अभिलिखित निष्कर्ष का समर्थन करते समय निवेदन किया है कि यह अविवादित तथ्य है कि वादी प्रथम प्रत्युत्तरदाता एक पर्दानशीन अशिक्षित महिला है और फिर भी उसके कंधों पर यह साबित करने के भार के साथ यह स्थापित करने के लिये कि प्रतिवादी-अपीलार्थी के पक्ष में वादी द्वारा निष्पादित मुख्तारनामा एक कटरचित दस्तावेज था, की गयी कार्यवाही विधि की एक प्रकट त्रुटि थी। दी हई परिस्थितियों में यह स्थापित करने के लिये सबत का भार प्रतिवादी संख्या 1.अपीलार्थी पर था कि 25 अप्रैल, 1995 को निष्पादित रजिस्ट्रीकृत मुख्तारनामा एक सत्य दस्तावेज था और केवल तब ही साबित करने का भार वादीप्रथम प्रत्युत्तरदाता पर अन्तरित किया जा सकता था और यह एक प्रकट स्पष्ट त्रुटि है जो विचारण न्यायाधीश द्वारा कारित की गयी थी, किन्तु आक्षेपित निर्णय में उच्च न्यायालय द्वारा उल्लेख किया गया था और उसमें इस न्यायालय द्वारा कोई अग्रेतर हस्तक्षेप आवश्यक नहीं है।।

12. हमने पक्षकारों के विद्वान अधिवक्तागण को सुना है और उनकी सहायता से अभिलेख पर उपलब्ध सामग्री का परिशीलन किया है।

13. वादी-प्रथम प्रत्युत्तरदाता ने सिविल न्यायाधीश (कनि० वर्ग), रुड़की के समक्ष एक वाद संख्या 155 वर्ष 1996 दाखिल किया था। वादपत्र की एक प्रति (सलग्नक पी.1) अभिलेख पर प्रस्तत की गयी है। वादपत्र के परिशीलन पर यह प्रकट होता है कि यह कहा भा अभिवचन नहीं किया गया है कि वादी-प्रथम प्रयुत्तरदाता एक पर्दानशीन अशिक्षित महिला है । साधारण क्रम में सबूत का भार उस पर होता है जो आक्रमण करता है। इसके विपरीत- वादपत्र में यह अभिवचन किया गया था कि प्रतिवादी संख्या 1 एवं उसके चाचा मंगता के पत्र हैं और प्रतिवादी संख्या 2 प्रतिवादी संख्या 1 की पत्नी है और उन्होंने वादी-प्रथम प्रत्यत्तरदाता की भूमि कब्जा करने का षड्यन्त्र रचा था और मौन सम्मति से मुख्खारनामा तैयार किया गया था और 51 अप्रैल 1995 को निबन्धन कार्यालय में वादी के नाम में रजिस्टीकत कराया गया था और उसके अनुसरण में, वाद भूमि रजिस्ट्रीकृत विक्रय-विलेख द्वारा विक्रय की गयी थी। अभिलेख पर अभिवचनों के आधार पर, ऊपर उल्लिखित आठ विवाद्यक विरचित किये गये थे जिस पर दोनों पक्षकारों ने मौखिक और दस्तावेजी
 
साक्ष्य प्रस्तुत किया है और विचारण न्यायाधीश ने साक्ष्य पर विचार करने के बाद निर्णय और डिक्री दिनांक 19 जनवरी, 2001 द्वारा वाद को खारिज कर दिया था और वादी-प्रथम प्रत्युत्तरदाता की प्रेरणा पर दाखिल अपील के 27 अगस्त, 2001 को खारिज होने पर उसकी अभिपुष्टि हो गयी थी। अभिलेख से यह प्रकट होता है कि बिना किसी वास्तविक आधार के होते हुये उच्च न्यायालय ने अपील ग्रहण करते समय विधि के दो सारवान् प्रश्न विरचित किये थे जिसके सम्बन्ध में अभिलेख पर कोई समर्थनकारी अभिवचन नहीं थे।

14. हमने फिर भी, अपने समाधान के लिये अभिलेख पर प्रस्तुत वादपत्र, संलग्नक पी-1, पर विचार किया है और हम इस समर्थन में अभिवचन पाने में विफल हैं कि वह एक पर्दानशीन अशिक्षित महिला थी और विधि का संरक्षण पाने के लिये अधिकृत थी और यह साबित करने का भार प्रतिवादी-अपीलार्थी पर था कि अभिकथित मुख्तारनामा कपट का परिणाम था।

15. पक्षकारों को सुनने के बाद, हमारी राय यह है कि दोनों अवर न्यायालयों के समवर्ती निष्कर्ष को उलटने में उच्च न्यायालय ने स्पष्ट रूप से प्रकट त्रुटि कारित की है और इस आधार पर आक्षेपित निर्णय संधार्य नहीं है।

16.  परिणामत:, अपील सफल होती है और तद्नुसार अनुज्ञात की जाती है। द्वितीय अपील में उच्च न्यायालय का निर्णय दिनांक 18 अगस्त 2008 एतद्द्वारा अपास्त किया जाता है। कोई व्यय नहीं।
 
17.  लम्बित आवेदन पत्र (त्रों), यदि कोई है, निस्तारित हो जायेंगे।
 
नोट : [ ज्ञानी लॉ द्वारा उक्त आदेशो का हिंदी रूपांतरण सिर्फ जन-सामान्य व् अधिवक्ता गणों को हिंदी में उक्त आदेशों को समझने हेतु प्रस्तुत किये जातें है इनका प्रयोग किसी भी विधिक कार्यवाही में करना त्रुटिपूर्ण होगा ]
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