राम अवतार सोनी बनाम महन्त लक्ष्मीधर दास

राम अवतार सोनी बनाम महन्त लक्ष्मीधर दास

(उच्चतम न्यायालय)
श्रीमती आर० बानुमथी एवं सुश्री इन्दिरा बनर्जी न्यायमूर्तिगण
सिविल अपील संख्या 10684-10685 वर्ष 2018
24 अक्टूबर 2018 को विनिश्चित

राम अवतार सोनी

बनाम

महन्त लक्ष्मीधर दास एवं अन्य

निर्णय

श्रीमती आर० बानुमथी, न्यायमूर्तिण्-अनुमति प्रदान की गयी। (राम अवतार सोनी बनाम महन्त लक्ष्मीधर दास)

2. ये अपीलें सी० एम० पी० संख्या 684 वर्ष 2016 में उड़ीसा उच्च न्यायालय कटक द्वारा पारित किये गये दिनांक 30/6/2016 के निर्णय से उद्भूत होती हैं, 

जिसमें और जिसके द्वारा उच्च न्यायालय ने प्रथम प्रत्युत्तरदाता के द्वारा दाखिल की गयी अपील को अनुज्ञात किया था, 

तद्द्वारा सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश XXVI, नियम 10क के अधीन पारित किये गये जिला न्यायाधीश के आदेश को अपास्त कर दिया था, 

तदद्वारा वसीयतकर्ता नटबर दास के स्वीकृत हस्ताक्षरों से तुलना के लिये प्रश्नगत वसीयत के हस्ताक्षर को हस्तलेख विशेषज्ञ के पास भेजने की अपीलार्थी की प्रार्थना को अनुज्ञात किया था।

3. वर्तमान अपीलार्थी ने प्रोबेट प्रकीर्ण वाद संख्या 14/5 वर्ष 2000ध/1997 में प्रथम प्रत्युत्तरदाता, अर्थात् लक्ष्मीधर महापात्रा के पक्ष में प्रदान किये गये प्रोबेट की वापसी की ईप्सा करते हुये सी० एस० संख्या

2/34 2008/2003 वर्ष दाखिल किया था। प्रोबेट प्रकीर्ण वाद में, महन्त नटबर दास के द्वारा निष्पादित की गयी प्रश्नगत वसीयत विवाद की विषयवस्तु थी, 

परन्तु अपीलार्थीध्वादी के अनुसार उक्त नटबर दास ने वसीयतकर्ता के रूप में प्रथम प्रत्युत्तरदाता-लक्ष्मीधर महापात्रा के पक्ष में कोई वसीयत कभी निष्पादित नहीं की थी। 

वादपत्र में यह कहा गया है कि स्वगीय महन्त नटबर दास ने अपने जीवनकाल के दौरान ।

जसोदा दासी के द्वारा अपने पक्ष में निष्पादित की गयी वसीयत के प्रोबेट के लिये प्रोबेट वाद संख्या 19/13 वर्ष 1982 दाखिल किया था और उक्त कार्यवाही में, 

महन्त नटबर दास का स्वीकृत हस्ताक्षर याचिका शपथ-पत्र, वकालतनामा अभिसाक्ष्य में उपलब्ध होने के लिये कहा गया है 

और उन दस्तावेजों में विद्यमान महन्त नटबर दास के हस्ताक्षरों को प्रश्नगत वसीयत के साथ तुलना के लिये हस्तलेख विशेषज्ञ के पास भेजा जाना आवश्यक है। 

और क्या प्रश्नगत वसीयत पर हस्ताक्षर उक्त नटबर दास का है अथवा नहीं है ? दूसरी तरफ प्रथम प्रत्युत्तरदाता का मामला यह है 

कि वसीयत को वसीयतकर्ता महन्त नटबर दास के द्वारा निष्पादित किया गया था और वह एक वास्तविक दस्तावेज था और इसका सक्षम न्यायालय के द्वारा विधिक रूप से प्रोबेट प्रदान किया गया था।

Ram Avatar Soni vs Mahanta Laxmidhar Das Judgment hindi

4. चूंकि अपीलार्थी प्रोबेट वाद संख्या 14/5 वर्ष 2000/1997 की वापसी की इस आधार पर ईप्सा करता है कि नटबर दास की वसीयत कपटपूर्ण है, 

विवाद्यक का आधार प्रथम प्रत्युत्तरदाता के पक्ष में नटबर दास के द्वारा निष्पादित की गयी वसीयत की वास्तविकता है। 

अपीलार्थी के द्वारा प्रथम प्रतयुत्तरदाता के पक्ष में अभिकथित रूप से महन्त नटबर दास के द्वारा निष्पादित तथा प्रोबेट प्रकीर्ण वाद संख्या 14/5 वर्ष 2000/1997 में प्राबेट की गयी प्रश्नगत वसीयत को नटबर दास के स्वीकृत हस्ताक्षरों, 

जो पूर्ववर्ती प्रोबेट वाद संख्या 19/13 वर्ष 1982 में न्यायालय में उपलब्ध हैं, को अन्तर्विष्ट करने वाले दस्तावेजों के साथ हस्तलेख विशेषज्ञ के पास भेजने के लिये सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश XXVI, नियम 10क के अधीन याचिका दाखिल की गयी थी।

5. आदेश XXVI नियम 10क के अधीन अपीलार्थी के द्वारा पहले दाखिल किये गये आवेदन को दिनांक 18.6.2013 के आदेश के माध्यम से जिला न्यायाधीश पुरी के द्वारा अनुज्ञात किया गया था।

प्रथम प्रत्युत्तरदाता ने रिट याचिका (सिविल) संख्या 14977 वर्ष 2013 में उच्च न्यायालय के समक्ष दिनांक 18.6.2013 के उक्त आदेश को चुनौती दी थी। 

दिनांक 14.8.2014 के आदेश के द्वारा उच्च न्यायालय ने दिनांक 18.6.2013 के आदेश को अपास्त कर दिया था और अवर न्यायालय को कार्यवाही के पश्चातवर्ती प्रक्रम पर, 

अर्थात् दोनों पक्षों के साक्ष्य की समाप्ति के पश्चात् आदेश XXVI, नियम 10क के अधीन दाखिल किये गये आवेदन पर विचार करने का निर्देश दिया था। उच्च न्यायालय ने पूर्ववर्ती तारीख पर सी० एस०। 

संख्या 2/34 वर्ष 2008/2003 में विचारण की कार्यवाही के निस्तारण का भी निर्देश दिया था। विचारण। प्रारम्भ हुआ था और पक्षकारों ने अपने साक्ष्य प्रस्तुत किये थे। 

उस प्रक्रम पर, जिला न्यायाधीश ने दिनांक 15.3.2016 के आदेश के माध्यम से यह निर्देशित करते हये सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश XXVI, 

नियम 10क के अधीन अपीलार्थीगण के द्वारा दाखिल किये गये आवेदन को अनुज्ञात किया था कि दिनांक 12.3.1989 की बसीयत को नटबर दास के स्वीकृत हस्ताक्षरों, 

जो प्रोबेट वाद संख्या 19/13 वर्ष 1982 में वकालतनामा और अभिसाक्ष्य में उपलब्ध हैं, से तुलना करने के लिये हस्तलेख-विशेषज जाये।

इस आदेश को उच्च न्यायालय के द्वारा आक्षेपित निर्णय के माध्यम से अपास्त कर दिया गया है। 

6. अपील तथा दिनांक 12.3.1989 की वसीयत को हस्तलेख विशेषज्ञ के पास भेजने की प्रार्थना का लिये प्रत्यत्तरदातागण ने अन्य बातों के साथ-साथ निम्नानुसार अनेक आधारों को उद्धृत किया

  1. प्रोबेट प्रकीर्ण वाद संख्या 14/5 वर्ष 2000/1997 में दिनांक 24.4.2001 के आदेश के माध्यम से दिनांक 12.3.1989 को महन्त नटबर दास के द्वारा प्रथम प्रत्युत्तरदाता-लक्ष्मीधर दास के पक्ष में निष्पादित की गयी वसीयत का विधि के अनुसार प्रोबट;
  2. प्रकीर्ण वाद संख्या 179/2001 के सम्बन्ध में आयुक्त धर्मदाय (ओडिसा), भवनेश्वर के कार्यालय ने दिनांक 25.1.2002 के आदेश के माध्यम से प्रथम प्रत्युत्तरदाता महन्त लक्ष्मीधर दास के द्वारा दाखिल किये गये दिनांक 4.1.2001 के आवेदन को निर्णीत किया था और कबीर चौरा के उक्त संस्थान का कब्जा तथा प्रबन्ध प्रदान किया थाय और
  3. सम्भागीय निरीक्षक धर्मदाय भूवनेश्वर के कार्यालय ने उड़ीसा हिन्दू धर्मदाय अधिनियम की धारा 41 के अधीन उक्त मठ के कब्जे तथा प्रबन्ध के सम्बन्ध में प्रथम प्रत्युत्तरदाता के पक्ष में दिनांक 4.9.2009 की रिपोर्ट संख्या 165 जारी की थी और प्रथम प्रत्युत्तरदाता के पक्ष में कब्जे को अनुज्ञात किया था।

    ओ० एस० संख्या 7/2007 में सहायक आयुक्त, धर्मदाय, भुवनेश्वर के द्वारा पारित किये गये दिनांक 28.1.2015 के आदेश के विरुद्ध महन्त गोपीदास के द्वारा दाखिल किये गये 

पुनरीक्षण में आर० सी० संख्या 6/2015 में आयुक्त, धर्मदाय के द्वारा दिनांक 13.5.2016 को पारित किये गये आदेश पर भी विश्वास व्यक्त किया गया है।

7. धर्मदाय के सम्बद्ध प्राधिकारियों के समक्ष सभी कार्यवाहियों में यह प्रतीत होता है कि प्राधिकारीगण ने प्रथम प्रत्युत्तरदाता-लक्ष्मीधर दास के पक्ष में,

मुख्य रूप से प्रोबेट वाद संख्या 14/5 वर्ष 2000/1997 में सिविल न्यायाधीश (वरिष्ठ वर्ग) के आदेश के आधार पर विभिन्न आदेश पारित किये हैं। प्रथम प्रत्युत्तरदाता को केवल दिनांक 24.4.2001 के उक्त प्रोबेट के आदेश के आधार पर ही संस्थान के प्रबन्ध में होने वाला व्यक्ति घोषित किया गया है।

8. जैसे कि पहले इंगित किया गया है अपीलार्थी ने प्रथम प्रत्युत्तरदाता के पक्ष में नटबर दास के द्वारा निष्पादित की गयी अभिकथित वसीयत की वास्तविकता को चुनौती देते हुये 

तथा वसीयत के प्रोबेट की वापसी की ईप्सा करते हुये वाद सी० एस० संख्या 2/34 वर्ष 2008/2003 दाखिल किया है। 

जैसे कि अपीलार्थी की ओर से उपसंजात होने वाले विद्वान वरिष्ठ अधिवक्ता के द्वारा निवेदन किया गया है,

उक्त वाद में विवाद्यक संख्या 3 विरचित किया गया है कि "क्या प्रतिवादी संख्या 1 ने कपट कारित करते हये उस वसीयत को प्रोबेट कराने की व्यवस्था की है, 

जो कूटरचित और विनिर्मित थी?" इसलिये प्रश्नगत वसीयत की वास्तविकता को निर्णीत किया जाना आवश्यक है 

कि क्या अभिकथित रूप से नटबर दास के द्वारा निष्यादित की गयी दिनांक 12.3.1989 की वसीयत में हस्ताक्षर को केवल दस्तावेज को हस्तलेख विशेषज्ञ के पास भेजकर ही सुनिश्चित किया जा सकता था। 

जैसे कि ऊपर विवेचन किया गया है, पहले रिट याचिका (सिविल) संख्या 14997 वर्ष 2013 में दिनांक 18.6.2013 के जिला न्यायाधीश के आदेश को अपास्त करते समय उच्च न्यायालय ने यह संप्रेक्षण किया है 

कि सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश XXVI नियम 10क के अधीन दाखिल किये गये आवेदन पर कार्यवाही के पश्चातवर्ती प्रक्रम पर, अर्थात् दोनों पक्षों से साक्ष्य की समाप्ति के पश्चात विचार किया जा सकता है। 

वादी/अपीलार्थी ने अपने साक्षियों की परीक्षा किये जाने के पश्चात् पुनः प्रश्नगत वसीयत को हस्तलेख विशेषज्ञ के पास भेजने की अपनी प्रार्थना का पुनर्कथन किया था। 

याद प्रश्नगत विलेख की वैज्ञानिक जांच सच्चाई को सनिश्चित करने को आसान बनाती है, तब न्याय के हित में स्वाभिविक रूप से उसे आदेशित किया जाना होगा। 

वाद में उठाये गये विवाद्यक को ध्यान में रखते हये। जिला न्यायाधीश दिनांक 12.3.1989 की प्रश्नगत वसीयत को हस्तलेख विशेषज्ञ के पास भेजने के लिये। आवेदन को अनुज्ञात करने में उचित था।

9. उच्च न्यायालय यह कथन करने में उचित नहीं था कि वादपत्र में अपीलार्थी ने केवल वसीयत की वास्तविकता को चुनौती दी थी 

और महन्त नटबर दास के हस्ताक्षर की वास्तविकता के सम्बन्ध में कहीं भी अभिकथन नहीं किया था। 

वसीयत की वास्तविकता को चुनौती देना अन्य बातों के साथ-साथ महन्त नटबर दास के हस्ताक्षर की वास्तविकता को चुनौती देने को इंगित करता है। 

हमारी राय में उच्च न्यायालय यह कथन करने में उचित नहीं था कि महन्त नटबर दास के हस्ताक्षर की वास्तविकता को विवादित करते हये कोई विनिर्दिष्ट अभिकथन नहीं था। 

पहली रिट याचिका (सिविल) संख्या 14977 वर्ष 2013 में, जब उच्च न्यायालय ने यह संप्रेक्षण किया है कि सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश XXVI नियम 10क के अधीन प्रार्थना पर पश्चात्वर्ती प्रक्रम पर विचार किया जा सकता है, 

उच्च न्यायालय सी० एस० संख्या 2/34 वर्ष 2008/2003 में दिनांक 15.3.2016 के जिला न्यायाधीश के आदेश को अपास्त करने में उचित नहीं था और आक्षेपित आदेश अपास्त किये जाने के लिये दायी है।

10. इसके परिणामस्वरूप सी० एम० पी० संख्या 684 वर्ष 2016 में उच्च न्यायालय के दिनांक 30.6.2016 के आक्षेपित आदेश को अपास्त किया जाता है और इन अपीलों को अनुज्ञात किया जाता है। 

जैसे कि जिला न्यायाधीश के द्वारा दिनांक 15.3.2016 के अपने आदेश में निर्देशित किया गया था, दिनांक 12.3.1989 की वसीयत को अपीलार्थी के द्वारा दाखिल की गयी याचिका में प्रस्तुत किये गये

दस्तावेजों के साथ और महन्त नटबर दास के स्वीकृत हस्ताक्षरों को अन्तर्विष्ट करते हये जिला न्यायाधीश के आदेश को तुलना के लिये हस्तलेख विशेषज्ञ के पास भेजा जाये। 

हस्तलेख विशेषज्ञ की रिपोर्ट की प्राप्ति के पश्चात् विचारण न्यायालय विधि के अनुसार विचारण पर अग्रसर होगा।

नोट : [ ज्ञानी लॉ द्वारा उक्त आदेशो का हिंदी रूपांतरण सिर्फ जन-सामान्य व् अधिवक्ता गणों को हिंदी में उक्त आदेशों को समझने हेतु प्रस्तुत किये जातें है इनका प्रयोग किसी भी विधिक कार्यवाही में करना त्रुटिपूर्ण होगा ]

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