रवि चन्द मंगला बनाम डिम्पल सोलानिया

रवि चन्द मंगला बनाम डिम्पल सोलानिया

(उच्चतम न्यायालय)
एल० नागेश्वरा राव एवं मोहन एम० शांतानागौदार, न्यायमूर्तिगण
सिविल अपील संख्या 9598 वर्ष 2018
18 सितम्बर 2018 को विनिश्चित

रवि चन्द मंगला
बनाम
डिम्पल सोलानिया एवं अन्य

निर्णय

एल० नागेश्वरा राव न्यायमूर्तिण्- अनुमति प्रदान की गयी।

1. अपीलार्थी द्वारा हरियाणा नगरीय ( किराये एवं बेदखली का नियंत्रण ) अधिनियम 1973 की धारा 13 के अधीन दाखिल बेदखली के लिये याचिका को किराया नियंत्रक द्वारा खारिज कर दिया गया था। किराया नियंत्रक का निर्णय अपील में अपीलीय प्राधिकारी फरीदाबाद द्वारा पुनरीक्षण में पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय, चण्डीगढ़ द्वारा पुष्ट किया गया था। उसके द्वारा व्यथित होकर यह अपील दाखिल की गयी।

2. अपीलार्थी उन परिसरों का भूस्वामी है जिसे 4.1.1957 को 58.26 पैसा प्रतिमाह के किराये के संदाय पर किराये पर दिया गया था। अपीलार्थी ने हरियाणा नगर ( किराया एवं बेदखली का नियंत्रण ) अधिनियम, 1973 की धारा 13 के अधीन बेदखली के लिये एक याचिका किरायेदारों को बेदखल करने के लिये निम्नलिखित आधारों पर दाखिल की थी :

  1. यह कि प्रत्युत्तरदातागण ने किराये के संदाय में व्यतिक्रम कारित किया है और क्वार बटी 1 संबत 2040 से प्रारम्भ होकर सावन सिंह सुधी 15 संबत 2015 तक 60 माह के किराये के बकाये में है,
  2. यह कि प्रत्युत्तरदाता संख्या 1 ने विवादित संपत्ति को प्रत्युत्तरदाता संख्या 2 एवं 3 को उपकिराये पर दे दिया है।
  3. यह कि प्रत्युत्तरदातागण ने विवादित सम्पत्ति के मूल्य एवं उपयोगिता को नष्ट कर दिया है
  4. यह कि प्रत्युत्तरदातागण पड़ोसियों के लिये उपद्रव हैं
  5. यह कि प्रत्युत्तरदातागण ने विवादित सम्पत्ति के उपयोग में परिवर्तन कर दिया है।

3.  किराया नियंत्रक ने विचारण के लिये निम्नलिखित विवाद्यक विरचित किये थे :

  1. क्या प्रत्युत्तरदाता संख्या 1 किराये के बकाये में है यदि ऐसा है तो उसका प्रभाव ? | ओ० पी० पी०
  2. क्या प्रत्युत्तरदाता संख्या 1 ने किराये पर दिये गये परिसर को प्रत्युत्तरदाता संख्या 2 एवं 3 को याचिकाकर्ता की सम्मति के बिना उपकिराये पर दिया है ? | ओ० पी० पी० 
  3. क्या प्रत्युत्तरदाता ने प्रश्नगत भवन के मल्य एवं उपयोगिता को तात्विक रूप से हानि पहुँचायी है ? | ओ० पी० पी० 
  4. क्या प्रत्युत्तरदातागण पड़ोसियों के लिये उपताप हैं यदि ऐसा है तो उसका प्रभाव ?
    ओ० पी० पी० 
  5. क्या प्रत्युत्तरदातागण ने किराये पर दिये गये परिसर के उपयोग को याचीगण की सम्मति के बिना परिवर्तित कर दिया है ? | ओ० पी० पी० 
  6. क्या यह याचिका पक्षकारों के संयोजन एव असंयोजन के कारण दोषपूर्ण है ? ओ० पी० आर० 

7. अनुतोष।

4.  किराया नियंत्रक ने यह संप्रेक्षण करते हये विवाद्यक संख्या 1 को प्रत्युत्तरदातागण के पक्ष में अवधारित किया था कि 1.9.1985 से 31.12.1988 के बीच के तीन वर्षों के लिये किराये का बकाया न्यायालय में निक्षिप्त किया गया था। किराया नियंत्रक ने यह संप्रेक्षण किया था कि विवादित सम्पत्ति का प्रत्युत्तरदातागण द्वारा उपकिरायेदारी पर उठाया जाना साबित नहीं किया गया था। अ० सा० 4 हर सरूप के साक्ष्य पर विश्वास व्यक्त किया गया था जिसने अपनी प्रतिपरीक्षा में यह स्वीकार किया था।

कि प्रथम प्रत्युत्तरदाता मेसर्स सोलानिया इंजीनियरिंग वर्क्स के नाम में कारोबार करना जारी रखे हुये था। किराया नियंत्रक की यह राय थी कि यह नहीं कहा जा सकता है कि प्रत्युत्तरदाता संख्या 1 विवादित सम्पत्ति पर अनन्य रूप से काबिज था। इसी प्रकार सम्पत्ति के तात्विक परिवर्तनों एवं प्रत्युत्तरदातागण द्वारा ग्रिलों के विनिर्माण की गतिविधि में सृजित उपताप से संबंधित विवाद्यक संख्या 3 एवं 4 को किराया नियंत्रक द्वारा अस्वीकार कर दिया गया था। 

विवाद्यक संख्या 5 को विनिश्चित करते समय किराया नियंत्रक ने किराया करार का परिशीलन किया था और इस बात से सहमत था कि प्रत्युत्तरदातागण को सम्पत्ति न केवल सॉ मिल को स्थापित करने के प्रयोजन के लिये दी गयी थी बल्कि किसी भी अन्य प्रकार के कारोबार को संचालित करने के लिये भी प्रदान की गयी थी। अपीलार्थी द्वारा उठाया गया यह तर्क कि सॉ मिल जिसके लिये उस सम्पत्ति को किराये पर दिया गया था

प्रत्युत्तरदातागण द्वारा बेदखली याचिका को दाखिल करने के 4/5 वर्ष पूर्व बंद कर दी गयी थी और ग्रिलों के विनिर्माण का कार्य हो रहा था जो उपयोग के परिवर्तन की कोटि में आता है किराया नियंत्रक द्वारा खारिज कर दिया गया। पूर्वोक्त के आधार पर किराया नियंत्रक ने बेदखली याचिका को खारिज कर दिया था। 

अपीलार्थी ने विवाद्यक संख्या 1 एवं 4 पर किराया नियंत्रक के निष्कर्ष को अपीलीय प्राधिकारी के समक्ष अपील में प्रश्नगत नहीं किया था। अपीलीय प्राधिकारी ने अन्य विवाद्यकों पर किराया नियंत्रक के निर्णय में कोई दोष नहीं पाया था। उपयोग के परिवर्तन के विवाद्यक पर अपीलीय प्राधिकारी ने यह पाया था कि प्रत्युत्तरदातागण किरायेनामे के करार के अनुसार सॉ मिल के अतिरिक्त कारोबार की अन्य गतिविधि को संचालित करने के लिये स्वतंत्र थे। 

उच्च न्यायालय ने इस मामले में अन्तर्ग्रस्त विवाद्यकों पर सावधानीपर्वक विवेचन किया था और यह अवधारित किया था कि न तो कोई उपकिरायेदारी थी और न ही परिसरों के मूल्य एवं उपयोगिता के प्रति कोई हानि कारित की गयी थी। उपयोग के परिवर्तन के अभिकथन को उच्च न्यायालय द्वारा अस्वीकार कर दिया गया था।

Ravi Chand Mangla vs Dimpal Soania Judgment Hindi

5 इस न्यायालय के समक्ष यह निवेदन किया गया था कि अपीलार्थी एक प्रतिष्ठित चिकित्सक है। जिसकी आयु 96 वर्ष है और प्रश्नगत परिसर लगभग 2000 वर्ग फीट का है जो भूमि के एक बृहत्तर भूखण्ड का भाग है जिसे अपीलार्थी पर्त प्रयोजन के लिये एक चिकित्सालय के विनिर्माण के लिये प्रयोग करने का आशय रखता है। इस प्रशंसनीय उद्देश्य को देखते हुये हमने मामले को इस मामले के समाधान के लिये पक्षकारों को समर्थ बनाने के लिये कई बार स्थगित किया था। हमारे अनुनय के बावजूद प्रत्यत्तरदातागण

किरायेदारगण इन परिसरों को खाली करने और किसी अन्य स्थान पर पुनर्स्थापित करने के लिये धन-संबंधी प्रतिकर को स्वीकार करने के इच्छुक नहीं थे। प्रत्युत्तरदातागण यह तर्क करते हैं कि यदि उन्हें इन परिसरों से बेदखल कर दिया जाता है तो वे अपनी जीविका खो देंगे। कोई अन्य विकल्प न होने के कारण हमने इस मामले को गुणावगुण पर विनिश्चय के लिये रखा था।


6. दो निवेदन हैं जिन्हें अपीलार्थी के निमित्त किया गया है। प्रथम बिन्दु किराये के बकाये के गैरसंदाय से संबंधित है। प्रत्युत्तरदातागण की ओर से दाखिल प्रति-शपथपत्र को यह निवेदन करने के लिये निर्दिष्ट किया गया था कि 1.4.1993 से 31.8.2009 तक के बकाये को केवल 24.9.2009 को ही संदत्त किया गया था जो किराये के असंदाय की कोटि में आयेगा जो कि बेदखली का एक आधार है। हमें भय है कि हम अपीलार्थी की ओर से किये गये निवेदन से सहमत नहीं हो सकते हैं। किराया नियंत्रक के निर्णय से यह स्पष्ट है कि किराये के बकाये को बेदखली की याचिका दाखिल करने के तीन वर्ष पूर्व के लिये संदत्त कर दिया गया था। प्रथम अपीलीय न्यायालय के निर्णय से यह भी स्पष्ट है कि अपीलार्थी ने किराये के संदाय में व्यतिक्रम से संबंधित विवाद्यक संख्या 1 पर किराया नियंत्रक के निष्कर्षों को अभ्याक्रमित नहीं किया था। हम अपीलार्थी को इस प्रक्रम पर किराये के बकाये के व्यतिक्रम के संदाय का निवेदन करने की अनुमति नहीं दे सकते।

7. अपीलार्थी की ओर से निवेदित मुख्य बिन्दु यह है कि परिसर जिसे सॉ मिल के लिये किराये पर दिया गया था उसे अब ग्रिलों के विनिर्माण के प्रयोजन के लिये प्रयुक्त किया जा रहा है जो उपयोग के परिवर्तन की कोटि में आता है। हमारे समक्ष किरायेदारी के करार के निबन्धनों के निर्वचन पर दोनों ही पक्षकारों द्वारा निवेदन किये गये थे। इस करार के परिशीलन पर हम सहमत हैं कि प्रत्युत्तरदातागण किरायेदार पर सॉ मिल से संबंधित कारोबार को ही संचालित करने के लिये कोई निर्बन्धन नहीं था। 

किरायेदार को कोई अन्य कारोबार भी संचालित करने की स्वतंत्रता प्रदान की गयी थी। किसी नकारात्मक करार के अभाव में उपयोग उससे अन्यथा जिसके लिये परिसर को किराये पर दिया गया था उपयोग करने की कोटि में नहीं आता है। ख् मोहन लाल बनाम जय भगवान 1988 (2)एस सीसी 474, । "गन्ने की पिराई" के लिये किराये पर लिये गये परिसर को कपड़े के कारोबार के लिये प्रयुक्त किया जा रहा था जिस मामले में भूस्वामी का यह तर्क कि उपयोग में परिवर्तन हआ था अस्वीकार कर दिया गया था। ख्दशरथ बाबूराव सांगले एवं अन्य बनाम काशीमठ भास्कर दाता 1994 सप्ली (1) एस सी सी 504, । हम अधीनस्थ न्यायालयों के निर्णयों से सहमत हैं जो इस न्यायालय द्वारा अधिकथित विधि के अनुसरण में है।

8. पूर्वोक्त निष्कर्षों की दृष्टि में हम उच्च न्यायालय के निर्णय से हस्तक्षेप करने का कोई कारण नहीं पाते हैं। अपील खारिज की जाती है। कोई व्यय नहीं।

नोट : [ ज्ञानी लॉ द्वारा उक्त आदेशो का हिंदी रूपांतरण सिर्फ जन-सामान्य व् अधिवक्ता गणों को हिंदी में उक्त आदेशों को समझने हेतु प्रस्तुत किये जातें है इनका प्रयोग किसी भी विधिक कार्यवाही में करना त्रुटिपूर्ण होगा ]

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