रोमा सोनकर बनाम म० प्र० राज्य लोक सेवा आयोग

रोमा सोनकर बनाम म० प्र० राज्य लोक सेवा आयोग

उच्चतम न्यायालय  
कुरियन जोसेफ एवं संजय किशन कौल, न्यायमूर्तिण्
सिविल अपील संख्या 7400 एवं 7401 वर्ष 2018 
31 जुलाई, 2018 को विनिश्चित 
 
रोमा सोनकर 
बनाम 
म० प्र० राज्य लोक सेवा आयोग एवं एक अन्य


निर्णय 

कुरियन जोसेफ, न्यायमूर्तिण् - अनुमति प्रदान की गयी।

2. अपीलार्थी वर्ष 2010 के दौरान आयोजित राज्य सेवा के लिये प्रतियोगी परीक्षा में उपस्थित हुआ था। उसने ऐसे कतिपय उत्तरों, जिसके लिये अंक प्रदान नहीं किये गये थे, जिसकी जानकारी सूचना का अधिकार आवेदन की प्रक्रिया में हुई थी, के लाभ की ईप्सा करते हये मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय क समक्ष उपागम किया था। 

विद्वान एकल न्यायाधीश के दिनांक 28.3.2016 के निर्णय के अनुसार नियुक्ति तथा वरिष्ठता पर पारिणामित लाभ प्रदान किया था उसे प्रत्युत्तरदाता संख्या 1/राज्य लोक सेवा आयोग के द्वारा खण्डपीठ के समक्ष चुनौती दी गयी थी। आक्षेपित निर्णय (यों) में यद्यपि खण्डपीठ सिद्धांतरू प्रक्रिया के सहमत थी

परन्तु खण्डपीठ विद्वान एकल न्यायाधीश द्वारा अनुतोष को स्वरूप प्रदान करने से बिलकुल खुश नहीं थी, इसलिये मामले को अनुतोष को स्वरूप प्रदान करने के मामले में विद्वान एकल न्यायाधीश के समक्ष वापस प्रेषित किया गया था। 

3. हम बहुत निग्रह गम्भीर हैं कि क्या खण्डपीठ एक अन्तरा-न्यायालय अपील में अनुतोष को स्वरूप प्रदान करने के मामले में रिट याचिका को वापस प्रेषित कर सकती थी। यह भारत के संविधान के अनुच्छेद 228 के अधीन उच्च न्यायालय की अधिकारिता का प्रयोग है। विद्वान एकल न्यायाधीश के साथ ही साथ खण्डपीठ ने उसी अधिकारिता का प्रयोग किया था। 

केवल वादकारियों की असुविधा को निवारित करने के लिये खण्डपीठ के द्वारा सन्निरीक्षण की एक अन्य प्रक्रिया का प्रावधान उच्च न्यायालय की शक्ति के निबन्धनों में किया गया है, परन्तु उसका तात्पर्य यह नहीं है कि एकल न्यायाधीश खण्डपीठ का अधीनस्थ है। 

रिट कार्यवाही होने के कारण, खण्डपीठ से मुख्य रूप से और अधिकांशत: विद्वान एकल न्यायाधीश द्वारा अपनाये गये अभिमत की सत्यता अथवा अन्यथा पर विचार करने के लिये अन्तरा-न्यायालय अपील में कहा गया था। इसलिये, हमारे विचार से, खण्डपीठ के लिये विद्वान एकल न्यायाधीश के समक्ष मामले को वापस प्रेषित करने के बजाय विद्वान एकल न्यायाधीश के निर्णय की सत्यता पर निर्णीत करके गुणावगुण पर अपील (लों) को निस्तारित करना आवश्यक है।

4. जब मामला इस न्यायालय के समक्ष आया था हमने मध्य प्रदेश राज्य के विद्वान स्थायी अधिवक्ता को यह सनिश्चित करने का निर्देश दिया था कि क्या आज यथाविद्यमान वाणिज्य कर निरीक्षक के पद में कोई रिक्ति उपलब्ध है। राज्य की ओर से ब्यौरेवार प्रतिशपथ पत्र दाखिल किया गया है। 

Roma Sonkar vs M.P. State Public Service Commission Judgment Hindi

यह इंगित किया गया है कि पश्चातवर्ती चयन संचालित किये गये हैं और यदि अपीलार्थी को इस प्रक्रम पर नियुक्त किया जाता है, उसका पहले से नियक्त किये गये अधिकारियों की वरिष्ठता पर गम्भीर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। शपथ-पत्र में यह भी कहा गया है कि यह अधिकथित करना प्रत्युत्तरदाता संख्या 1/राज्य लोक सेवा आयोग का कर्तव्य है। 

कि क्या आवेदक को अन्यथा चयनित किया गया होता। पूछे जाने पर, प्रत्युत्तरदाता संख्या 1/राज्य लोक सेवा आयोग की ओर से उपस्थित विद्वान अधिवक्ता ने यह निवेदन किया है कि यदि अपीलार्थी को अंकों का लाभ प्रदान किया गया होता, तब वह सफल हो गया होता।

5. उक्त परिस्थितियों में, हमारा यह विचार है कि यही केवल न्याय के हित में है और पक्षकारों के बीच पर्ण न्याय करने के लिये यह कि अपीलाथा का, इस पूर्व निर्णय के रूप में माने बिना वाणिज्य कर निरीक्षक के उपलब्ध पदों में से एक में नियुक्त किया जाये। तद्नुसार आदेशित किया गया। 

वरिष्ठता के सम्बन्ध में किसी भविष्यवर्ती विवाद को निवारित करन क लिये, हम यह स्पष्ट करते हैं कि अपीलार्थी केवल 1.8.2018 से प्रभावी रूप में ही वरिष्ठता का हकदार होगा। नियुक्ति आज से चार सप्ताह के भीतर प्रभावी की जायेगी। हम यह भी स्पष्ट करते हैं कि यदि अपीलार्थी को आज से चार सप्ताह के भीतर नियुक्ति पत्र जारी नहीं किया जाता है, तब सभी प्रयोजनों के लिये अपीलार्थी को 1.9.2018 से प्रभावी रूप में नियुक्त किया गया समझा जायेगा।

6. अपीलें तद्नुसार निस्तारित होती हैं।
7. लम्बित आवेदन, यदि कोई हो, निस्तारित होंगे।
8. व्ययों के बारे में कोई आदेश नहीं होगा।

नोट : [ ज्ञानी लॉ द्वारा उक्त आदेशो का हिंदी रूपांतरण सिर्फ जन-सामान्य व् अधिवक्ता गणों को हिंदी में उक्त आदेशों को समझने हेतु प्रस्तुत किये जातें है इनका प्रयोग किसी भी विधिक कार्यवाही में करना त्रुटिपूर्ण होगा ]

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