सेण्ट्रल बोर्ड ऑफ़ ट्रस्टीज बनाम इन्दौर कम्पोजिट प्राइवेट लिमिटेड

सेण्ट्रल बोर्ड ऑफ़ ट्रस्टीज बनाम  इन्दौर कम्पोजिट प्राइवेट लिमिटेड

उच्चतम न्यायालय   
अभय मनोहर सप्रे एवं नवीन सिन्हा, न्यायमूर्तिण्
सिविल अपील संख्या 7240 वर्ष 2018
26 जुलाई, 2018 को विनिश्चित

सेण्ट्रल बोर्ड ऑफ़ ट्रस्टीज
बनाम 
इन्दौर कम्पोजिट प्राइवेट लिमिटेड

 निर्णय

अभय मनोहर सप्रे, न्यायमूर्तिण - अनुमति प्रदान की गयी।

2. यह अपील रिट याचिका संख्या 1046 वर्ष 2017 में मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय, इन्दौर पीठ के द्वारा पारित किये गये दिनांक 1.8.2017 के अन्तिम निर्णय तथा आदेश के विरुद्ध दाखिल की गयी है, जिसके द्वारा उच्च न्यायालय की खण्डपीठ ने वर्तमान अपीलार्थी के द्वारा दाखिल की गयी रिट याचिका को खारिज कर दिया था

और ए० टी० ए० संख्या 214 (8) वर्ष 2015 में कर्मचारी भविष्य निधि अपीलीय अधिकरण, नई दिल्ली के द्वारा पारित किये गये दिनांक 6.9.2016 के आदेश को अभिपुष्ट किया था।

3. मामले के तथ्य संक्षिप्त परिधि में स्थित हैं और यहां नीचे कथित तथ्यों से वह स्पष्ट होगा।

4. 19.5.2008 को, अपीलार्थी-सेण्ट्रल बोर्ड ऑफ ट्रस्टीज ने वर्ष 2005-2006 में अर्द्धप्रबुद्ध श्रेणी के अधीन कर्मचारियों के लिये विहित न्यूनतम पारिश्रमिक से कम पारिश्रमिक पर भविष्य निधि योगदान के असंदाय के लिये प्रत्युत्तरदाता-मेसर्स इन्दौर कम्पोजित प्राइवेट लिमिटेड को कर्मचारी भविष्य निधि और मिश्रित प्रावधान अधिनियम, 1952 (एतस्मिनपश्चात् "अधिनियम" के रूप में निर्दिष्ट) की धारा 7क के अधीन समन जारी किया था। प्रत्युत्तरदाता का प्रतिनिधि जांच में उपस्थित हुआ था 

और यह निवेदन किया था कि विभाग ने वर्ष 2005-2006 के लिये प्ररूप 3क में पहले से ही प्रस्तुत किये गये कर्मचारियों के अकार्यकारी दिवसों पर विचार नहीं किया है और कुछ कर्मचारी अप्रबुद्ध श्रेणी के अधीन हैं, जबकि विभाग ने उनमें से सभी को अर्द्धप्रबुद्ध रूप में माना है। 

अपीलार्थी ने पूर्वोक्त पर विचार करने के पश्चात्, दिनांक 15.4.2010 के आदेश के द्वारा, प्रत्युत्तरदाता को उस आदेश की प्राप्ति से 15 दिन के भीतर ₹ 87,204 का निक्षेप करने के लिये निर्देशित किया था। यह भी कहा गया था कि धारा क के अधीन उक्त आदेश अधिनियम की धारा 7ग, 7थ और 14ख के अधीन किसी कार्यवाही पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना होगा।

Central Board of Trustees vs Indore Composite Pvt. Ltd. Judgment Hindi

5. 21.1.2015 को, अपीलार्थी ने अधिनियम की धारा 14ख के अधीन शक्ति के प्रयोग में प्रत्युत्तरदाता को 1/2007 से 02/2006 तक से 05/2013 तक विलम्बित संदायों के लिये प्रत्युत्तरदाता को ₹ 91,585 की क्षतिपूर्ति तथा सहबद्ध शोध्यों को संदत्त करने का आदेश दिया था। 

6. उक्त आदेश को चुनौती देते हुये प्रत्युत्तरदाता ने कर्मचारी भविष्य निधि अपीलीय अधिकरण, नई दिल्ली के समक्ष ए० टी० ए० संख्या 214 (8) वर्ष 2015 नामक अपील दाखिल की थी। 

अधिकरण ने दिनांक 6.9.2016 के आदेश के माध्यम से अपील को अनुज्ञात किया था और अपीलार्थी के द्वारा पारित किये गये दिनांक 21.1.2015 के आदेश को अपास्त कर दिया था।

7. व्यथित महसूस कर अपीलार्थी ने उच्च न्यायालय के समक्ष रिट याचिका संख्या 1046 वर्ष 2017 नामक रिट याचिका दाखिल किया। उच्च न्यायालय ने आक्षेपित आदेश के द्वारा याचिका को खारिज कर दिया था।

8. अपीलार्थी ने व्यथित महसूस किया था और इस न्यायालय के समक्ष विशेष अनुमति के माध्यम से वर्तमान अपील दाखिल की थी। 29. संक्षिप्त प्रश्न, जो इस अपील में विचारण के लिये उद्भूत होता है, यह है कि क्या उच्च न्यायालय की खण्डपीठ अपीलार्थी की रिट याचिका को खारिज करने करने में न्यायसंगत था।

10. पक्षकारों के विद्वान अधिवक्तागण को सुना गया।

11. पक्षकारों के विद्वान अधिवक्तागण को सुनने तथा मामले के अभिलेख का परिशीलन करने के पश्चात्, हम अपील को अनुज्ञात करने, आक्षेपित आदेश को अपास्त करने और मामले को रिट याचिका को । विधि के अनुसार गुणावगुण पर नये सिरे से निर्णीत करने के लिये उच्च न्यायालय की खण्डपीठ के समक्ष प्रतिप्रेषित करने के लिये विवश हैं।

12. तथ्यों को प्रस्तत करने के पश्चातण् खण्डपीठ अपने अन्तिम पैरा में निम्नलिखित संप्रेक्षणों के साथ रिट याचिका को निस्तारित करने के लिये अग्रसर हुई थी, जो निम्न प्रकार से पठित है:

                   "अभिलेख पर अतिरिक्त दस्तावेजों को लेने के लिये नये दस्तावेजों तथा शपथ पत्र के आधार पर पूर्वोक्त पर सम्यक् विचारण के पश्चात् हम प्रतिष्ठान को मार्च, 2006.अप्रैल, 2010 तक की अवधि के लिये क्षतिपूर्ति संदत्त करने हेतु निर्देशित नहीं कर सकते हैंण् जब विद्वान अधिकरण के समक्ष इन सभी आपत्तियों को नहीं लिया गया था।

                  पूर्वोक्त पर विचार करने के पश्चात, हमारा यह विचार है कि विद्वान अधिकरण के द्वारा पारित किया गया आदेश न्यायसंगत तथा उचित है और आक्षेपित आदेश में कोई हस्तक्षेप प्राधिकृत नहीं है।

                  याची के द्वारा दाखिल की गयी रिट याचिका में कोई बल नहीं है और उसे तद्नुसार खारिज किया जाता है।"

13. हमारी राय में, उच्च न्यायालय के समक्ष मामले को प्रतिप्रेषित करने की आवश्यकता इस कारण से उद्भूत हुई है कि खण्डपीठ ने अपीलार्थी (याची) के द्वारा दाखिल की गयी रिट याचिका को मामले में उद्भूत किसी भी विवाद्यक तथा पक्षकारों के द्वारा अपने मामले के समर्थन में आग्रह किये गये तर्कों पर भी विचार किये बिना सरसरी तौर पर खारिज कर दिया था।

14. वास्तव में. अपील में अन्तर्ग्रस्त तथ्यात्मक और विधिक विवाद्यक पर न्यायिक मस्तिष्क के किसी प्रयोग के अभाव में और विवाद्यकों पर और रिट याचिका में आक्षेपित निष्कर्ष क्यों असंपुष्ट अथवा उलटे जाने के लिये दायी है, किसी विचार-विमर्श, मूल्यांकन, तर्क और स्पष्ट निष्कर्ष के बिना मामले के प्रति प्रयोज्यनीय विधिक सिद्धांतों के परिप्रेक्ष्य में, पक्षकारों के तर्कों पर विचार करते समय इस न्यायालय के लिये। खण्डपीठ के ऐसे आदेश को संधार्य बनाना कठिन है। 

अपील को निस्तारित करने में खण्डपीठ के द्वारा प्रयक्त एकमात्र अभिव्यक्ति "सम्यक विचारण पर" है। हमें यह स्पष्ट नहीं है कि वह सम्यक विचारण क्या था, जिसने खण्डपीठ को रिट याचिका को निस्तारित करने के लिये प्रेरित किया था, क्योंकि हम यह पाते हैं कि पूर्ववर्ती पैरों में केवल तथ्यों को प्रस्तुत किया गया है।

15, इस न्यायालय ने बार-बार प्रत्येक मामले में कारणयुक्त आदेश पारित करने की आवश्यकता के लिये न्यायालयों पर बल दिया है, जिसमें विवाद के पक्षकारों के मामले के सामान्य तथ्यों, मामले में उदभत विवाद्यकों, पक्षकारों के द्वारा आग्रह किये गये तर्को, अन्तर्ग्रस्त विवाद्यकों पर प्रयोज्यनीय विधिक सिद्धांतों तथा मामले में उदभत सभी विवाद्यकों पर निष्कर्षों के समर्थन में कारणों तथा पक्षकारों के विद्वान अधिवक्ता के द्वारा अपने निष्कर्ष के समर्थन में किये गये आग्रह का प्रकथन अन्तर्विष्ट होना चाहिये। 

यह वास्तविक रूप में दर्भाग्यपर्ण है कि खण्डपीठ रिट याचिका को निस्तारित करते समय इन सिद्धांतों को ध्यान में रखने में विफल रही थी। हमारी राय में, ऐसे आदेश ने निरूसंदेह पक्षकारों पर प्रतिकूल प्रभाव कारित किया है क्योंकि उसने उन्हें इसके बारे में कारणों को जानने से वंचित किया है कि एक पक्षकार क्यों जीत गया है और अन्य पक्षकार क्यों हार गया है। 

हम उस रीति का समर्थन कभी नहीं कर सकते हैं, जिसमें उच्च न्यायालय के द्वारा ऐसा आदेश पारित किया गया था, जिसने हमें मामले को गुणावगुण पर रिट याचिका को नये सिरे से निर्णीत करने। के लिये उच्च न्यायालय के समक्ष प्रतिप्रेषित करने के लिये विवश किया है। 

16. पर्वगामी विचार-विमर्श के परिप्रेक्ष्य में हम अपील को अनुज्ञात करते हैं, आक्षेपित आदेश को अपास्त करते हैं तथा मामले को हमारे ऊपर किये गये संप्रेक्षणों को ध्यान में रखते हुये, रिट याचिका को विधि के अनुशार गुणावगुण पर नए सिरे से निर्णीत करने के लिये उच्च न्यायालय की खण्डपाठक समता प्रतिप्रेषित करते हैं।

17. तथापि, हम यह स्पष्ट करते हैं कि हम मामले को पूर्वोलिखित कारणों से उच्च न्यायालय के द्य समक्ष प्रतिप्रेषित करने के लिये राय बनाने के कारण, विवाद के गुणावगुण पर कोई संप्रेक्षण करने से प्रविरत रहे हैं। इसलिये, उच्च न्यायालय हमारे किसी भी संप्रेक्षण के द्वारा प्रभावित हुये बिना कठोरतापूर्वक विधि के अनुसार रिट याचिका को निर्णीत करेगा।

18. पूर्वोक्त निर्देशों के साथ तद्नुसार अपील अनुज्ञात की जाती है और आक्षेपित आदेश को अपास्त किया जाता है।

नोट : [ ज्ञानी लॉ द्वारा उक्त आदेशो का हिंदी रूपांतरण सिर्फ जन-सामान्य व् अधिवक्ता गणों को हिंदी में उक्त आदेशों को समझने हेतु प्रस्तुत किये जातें है इनका प्रयोग किसी भी विधिक कार्यवाही में करना त्रुटिपूर्ण होगा ]

Newest
Previous
Next Post »

Thank you !
We will reply to you soon ConversionConversion EmoticonEmoticon