करेंसी नोट प्रेस बनाम एन० एन० सरदेसाई

करेंसी नोट प्रेस बनाम एन० एन० सरदेसाई

उच्चतम न्यायालय   
अभय मनोहर सप्रे एवं एस० अब्दुल नजीर, न्यायमूर्तिण्
सिविल अपील संख्या 5152 वर्ष 2017
20 जुलाई, 2018 को विनिश्चित 

 
करेंसी नोट प्रेस एवं एक अन्य
बनाम 
एन० एन० सरदेसाई एवं अन्य

 निर्णय 

अभय मनोहर सप्रे, न्यायमूर्ति- यह अपील रिट याचिका संख्या 534 वर्ष 1997 में बम्बई उच्च न्यायालय के द्वारा पारित किये गये दिनांक 21.10.2011 के अन्तिम निर्णय तथा आदेश के विरुद्ध दाखिल की गयी है, 

जिसके द्वारा उच्च न्यायालय के विद्वान एकल न्यायाधीश ने वर्तमान प्रत्युत्तरदातागण के द्वारा दाखिल की गयी रिट याचिका को अनुज्ञात किया था और श्रम न्यायालय द्वारा पारित किये गये दिनांक 16.2.1995 के आदेश को अपास्त किया था तथा प्रत्तरदातागण के आवेदन को अनुज्ञात किया था।

2. अपील में अन्तर्ग्रस्त संक्षिप्त विवाद्यक का मूल्यांकन करने के लिये आवश्यक सीमा तक के सिवाय तथ्यों को विस्तारपूर्वक प्रस्तुत करना आवश्यक नहीं हो सकता है।

3. अपील में अन्तर्ग्रस्त प्रश्न यह है कि क्या उच्च न्यायालय प्रत्युत्तरदातागण (कर्मचारीगण) की रिट याचिका को अनुज्ञात करने में न्यायसंगत था और इसलिये श्रम न्यायालय द्वारा पारित किये गये आदेश को अपास्त करने में न्यायसंगत था। 

4. वर्तमान अपीलार्थीगण वित्त मंत्रालय, भारत सरकार के स्वामित्वाधीन तथा उसके नियंत्रण के अधीन कार्य करते हये निगमित निकाय है और उसे करेंसी नोटों को मुद्रित करने और सात ही अन्य इकाइयों के साथ सिक्कों को ढालने का कार्य करने के लिये विनिर्दिष्ट रूप से निगमित किया गया था। यह मुद्रण प्रेस नासिक (महाराष्ट्र) में है। प्रत्युत्तरदातागण (कुल 17) सुसंगत समय पर सभी विभिन्न पदों, जैसे कनिष्ठ लेखा अधिकारीध्प्रधान लेखाकार और अनुभाग अधिकारी के रूप में अपीलार्थीगण के मुद्रण प्रेस के कर्मचारीगण थे।

5. प्रत्युत्तरदातागण ने अपीलार्थीगण के कर्मचारी होने का दावा करते हुये श्रम न्यायालय संख्या 2, बम्बई (संक्षेप में "श्रम न्यायालय") के समक्ष अपीलार्थीगण के विरुद्ध अपने द्वारा वर्ष 1986 से 1990 का अवधि के लिये अपने कतव्यों के निर्वहन में किये जाने के लिये दावाकृत कार्य के अतिरिक्त समय के पारिश्रमिक का दावा करते हुये औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 की धारा 33ग (2) के अधीन आवेदन दाखिल किया था। अपीलार्थीगण ने इन आवेदनों का तथ्यों तथा विधि पर विरोध किया था।

Currency Note Press vs N. N. Sardesai Judgment Hindi

6. दिनांक 16.2.1995 के आदेश के द्वारा, श्रम न्यायालय ने आवेदनों को खारिज कर दिया था। प्रत्युत्तरदातागण ने व्यथित महसूस किया था और श्रम न्यायालय के आदेश को चुनौती देते हुये बम्बई उच्च न्यायालय के समक्ष रिट याचिका दाखिल की थी।

7. आक्षेपित आदेश के द्वारा एकल न्यायाधीश ने प्रत्युत्तरदातागण की रिट याचिका को अनुज्ञात किया था और श्रम न्यायालय के आदेश को अपास्त करते समय प्रत्युत्तरदातागण के आवेदनों को अनुज्ञात किया था और उन्हें दावाकृत मौद्रिक अनुतोष को प्रदान किया था। इसी आदेश के विरुद्ध अपीलार्थीगण (नियोजकों) ने व्यथित महसूस किया है और इस न्यायालय के समक्ष विशेष अनुमति के माध्यम से यह अपील दाखिल की हैं।

8. पक्षकारों के विद्वान अधिवक्ताओं को सुनने तथा मामले के अभिलेख का परिशीलन करने के पश्चात् हम एतस्मिन पश्चात् उल्लिखित एक से अधिक कारणों से अपील को खारिज करने के इच्छुक हैं।

9. पहलाए सभी प्रत्युत्तरदातागण (कुल 17) अब सेवा में नहीं हैं और या तो सेवा से सेवानिवृत्त हो गये हैं या उनकी मृत्यु हो गयी है। दूसरा, अन्तर्ग्रस्त और प्रत्युत्तरदातागण को प्रदान की गयी धनराशि अधिक नहीं है; तीसरा, वह वर्ष 1986-1990 की अवधि से सम्बन्धित है य चौथा, 

आक्षेपित आदेश के अनुसरण में धनराशि प्रत्युततरदातागण को बहुत पहले संदत्त कर दी गयी थी ; और अन्ततः, जैसा कि ऊपर उल्लेख किया गया है, वह इन प्रत्युत्तरदातागण (कर्मचारीगण) के द्वारा ड्यूटी पर रहते समय स्वीकृत रूप से किये गये अतिरिक्त समय के कार्य से सम्बन्धित है।

10. इन पांचों तथ्यात्मक कारणों की दृष्टि में हम उच्च न्यायालय के आक्षेपित आदेश में हस्तक्षेप करने के इच्छुक नहीं हैं।

11. तथापिए अपीलार्थीगण (नियोजकों) के विद्वान अधिवक्ता ने अनेक विधिक विवाद्यकों पर तर्क किया था, जो-उसके अनुसार मामले में उद्भूत होते हैं। ये तर्क बम्बई दुकान और प्रतिष्ठान अधिनियम, 1948 और कारखाना अधिनियम, 1948 के कतिपय प्रावधानों के निर्वचन से सम्बन्धित हैं।

12. ऊपर प्रस्तुत किये गये पांच तथ्यात्मक कारणों, जो स्वीकृत रूप से मामले के अभिलेख से उद्भत होते हैं, को ध्यान में रखते हये, हम अपीलार्थीगण के विद्वान अधिवक्ता के द्वारा आग्रह किये गये विधिक प्रश्नों की जांच करने के इच्छुक नहीं हैं और इन प्रश्नों को किसी अन्य मामले में उनके गुणावगुण पर अपने निर्णयन के लिये खुला छोड़ने के लिये उपयुक्त समझते हैं।

13. पूर्वगामी विचार-विमर्श की दृष्टि में अपील विफल होती है और तद्नुसार खारिज की जाती है।

नोट : [ ज्ञानी लॉ द्वारा उक्त आदेशो का हिंदी रूपांतरण सिर्फ जन-सामान्य व् अधिवक्ता गणों को हिंदी में उक्त आदेशों को समझने हेतु प्रस्तुत किये जातें है इनका प्रयोग किसी भी विधिक कार्यवाही में करना त्रुटिपूर्ण होगा ]

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